उत्तम क्षमा धर्म के साथ दसलक्षण पर्व हुए प्रारंभ क्षमा धर्म हमारे अंदर भाव से उतरना चाहिए आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी
28 अगस्त 2025 से उत्तम क्षमा धर्म के साथ 10 लक्षण पर्व का शुभारंभ हो गया। सुबह 5:00 बजे से ही भक्तों का मंदिर आना शुरू हो गया। प्रातः 5:15 पर आचार्य श्री108 विनिश्चय सागर महाराज के द्वारा ध्यान कराया गया इसमें काफी संख्या में भक्त मौजूद रहे। इसके उपरांत मूल नायक भगवान शांतिनाथ का अभिषेक एवं शांति धारा की गई एवं मंदिर परिसर में सभी वेदियों पर विधि विधान के साथ अभिषेक पूजन किया गया इसी क्रम में प्रवचन सभा स्थल पर आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में श्रीजी का अभिषेक एवम शांति धारा संपन्न हुई। क्रियाएं विधि विधान के साथ ब्रह्मचारी स्वतंत्र भैया एवं ब्रह्मचारी राहुल भैया ने संपन्न कराई। इसके बाद सामूहिक पूजन किया गया जो संगीत स्वर लहरियों के साथ भक्ति भाव से संपन्न हुई। इसके उपरांत तत्वार्थ सूत्र के 10 अध्याय के तीन मुख्य मंडलों पर तीन मुख्य परिवारों द्वारा अरघ समर्पित किए गए बनाए गए तीन मुख्य मंडल आकर्षण का केंद्र बिंदु है। जो आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य मे सम्पन्न किया गया
मंगल प्रवचन देते हुए आचार्य श्री ने उत्तम क्षमा के विषय पर प्रकाश डाला आचार्य श्री ने कहा धन चला जाता है तन चला जाता है लेकिन क्रोध नहीं जाता क्रोध आत्मा में बैठे राग द्वेष का परिणाम है। कषाय अपने आप कभी नहीं आती सबसे बड़ा क्रोध का कारण धन दूसरा कारण मन की नहीं होना तीसरा कारण है सब हमारे अनुसार चले। क्रोध इन्हीं तीन चीजों के कारण होता है। उन्होंने कहा धन का बचाना और धन का न खर्च करना अच्छा है। दोनों ही चीज अच्छी नहीं है। खर्च करोगे तो भोगों में इंद्री के विषयों में। और बचाओगे तो आने वाली पीढ़ी के लिए व्यय भी ठीक नहीं संग्रह भी ठीक नहीं है व्यय पाप में डालता है संग्रह परिग्रह में जाता है। जितनी जरूरत है उतना ही कमाओ। जितनी जरूरत है उतना ही खर्च करो। जितनी जरूरत है उतना ही संग्रह करो। अधिक धन और कम धन संकलेश का कारण है दैनिक जीवन की कही वस्तुएं क्रोध के कारण हमारे पास से चली जाती हैं।

आचार्य श्री ने कहा क्षमा धर्म हमारे अंदर भाव से उतरना चाहिए धर्म और अधर्म के विषय में बताया। जब हम अधर्म से जुड़ते हैं कषाये बढ़ती है जब हम धर्म से जुड़ते हैं तो गुण बढ़ते हैं। महाराज जी ने जिन मंदिर को गुणों का खजाना है।
धर्म कहता है क्रिया को जीवंत बनाना चाहिए हमें उसमें प्राण फूकना चाहिए भाव बनाकर मन में ऐसी सहनशीलता आनी चाहिए की मन में क्षमा के अलावा कुछ नहीं हो। कोई हमारे सामने हथियार लेकर भी आ जाए तो हम कुछ नहीं कहेंगे। ऐसी सहनशीलता को ही उत्तम क्षमा कहते हैं।


शब्दों की क्षमा नहीं भावों की क्षमा हो। भाव व्यवस्थित हैं तो क्षमा भी व्यवस्थित रहेगी क्षमा का अर्थ होता है आस्था की परिपक्ता और चारित्र क्षमा का अर्थ कायरता नहीं होती। क्रोध को ऐसे छोड़ो जैसे विष को छोड़ो दिनभर एक ही भाव रखे उत्तम क्षमा कोई टेढ़ी निगाह से देखे तो भी उत्तम क्षमा। जो चाहिए वह नहीं हो रहा है सामने वाला आपका भाव नहीं समझ रहा है तो भी क्या रखना उत्तम क्षमा।

कषायों की मंदता का आनंद अलग है। उन्होंने कहा उत्तम क्षमा तब आएगी जब कषाय मंद होगी। उन्होंने कहा कि क्षमा धर्म हमारे अंदर भाव से उतरना चाहिए।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

