आगम साधु के नेत्र हैं समाज को धर्म के लिए संगठित होना बहुत जरूरी हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

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आगम साधु के नेत्र हैं समाज को धर्म के लिए संगठित होना बहुत जरूरी हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी
टोंक
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चातुर्मास हेतु संघ सहित टोंक विराजित है।आज उपदेश में बताया कि साधु के नेत्र आगम है साधु को आगम अनुसार चलना चाहिए ,साधु का लक्षण परिग्रह रहित , कषाय रहित होकर स्वाध्याय प्रेमी होना चाहिए। सभी  समाज को जोड़ना चाहिए यदि समाज जोड़ नहीं सके तो तोड़ना का कारण नहीं होना चाहिए।

वर्तमान में समाज को संगठित होना बहुत जरूरी है। सभी को प्रेम ,वात्सल्य भाव रखकर समाज को संगठित करना चाहिए। संत वाद और पंथवाद के सन्दर्भ में बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी ,श्री वीरसागर जी के जीवन,उपदेश से तथा,श्री शिवसागर जी, श्री धर्मसागर जी श्री अजीतसागर जी, श्री श्रुतसागर जी महाराज के मंगल सानिध्य में यही शिक्षा ज्ञान ग्रहण किया कि हम अपनी छोड़ेगे नहीं,और आपकी बिगाड़ेंगे भी नहीं।यह सूत्र हमने जीवन में 57 वर्षों के संयम जीवन में अपनाया हैं और शिष्यों को भी यही प्रेरणा देते है। यह मंगल देशना प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव की दो दिवसीय गोष्ठी में आयोजित विद्वानों की सभा में प्रकट की।

राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि हम किसी विद्वान के आलेख विचार पर टिप्पणी नहीं करेंगे आपकी अपनी ठेस बचाने के लिए आगम को ठेस नहीं लगना चाहिए। केवली भगवान द्वारा तीर्थंकरों और केवली भगवान की प्रतिपादित जिनवाणी आगम 400 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। साधुओं विद्वानों ओर समाज को वर्तमान में प्राचीन परंपराओं को तोड़ा जाना या बदला जाना उचित नहीं है। प्राचीन आगम परंपरा में परिवर्तन बदलाव करने से समाज में विवाद और विघटन होता है। साधु का हमेशा उदासीन भाव रहना चाहिए। ट्रस्ट मंदिर संपति का निजी उपभोग हानिप्रद हैं।आचार्य श्री शांति सागर जी श्रमण साधु परम्परा कुल के पितामह थे हैं और रहेंगे ।आचार्यश्रीआत्म विद्या के महाज्ञानी थे उनमें आत्मज्ञान बहुत था ,आत्मा ही सर्वश्रेष्ठ है वह अनासक्ति के सर्वोच्च शिखर पर रहे गृहस्थ अवस्था से वह अनासक्ति और निष्प्रही रहे उनमें बचपन से वैराग्य और चारित्र ,अपने ज्ञान से सभी को वह स्वाध्याय की प्रेरणा देते थे। हम उनके जैसी तपस्या नहीं कर सकते किंतु समन्वय का गुण संघ परंपरा अनुसार आज भी विद्यमान हैं। । विद्वत संगोष्ठी आयोजन के मुख्य संयोजक डॉ श्री चिरंजीलाल बगडा ओर डा श्री सुनील संचय अनुसार इसके पूर्व मंगलाचरण दीप प्रवज्जलन के बाद अतिथियों ने आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की।चातुर्मास समिति ओर जैन समाज द्वारा आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में प्रस्तुत आलेखों के संकलन की पुस्तक का विमोचन आचार्य संघ सानिध्य में विद्वानों ने किया। सभी अतिथियों का श्रीफल माला शाल स्मृति चिन्ह से सम्मान किया गया।आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की प्रेरणा से पूरे भारत में वर्ष 2024 से वर्ष 2025 तक मनाया जा रहा हैं 23 और 24 अगस्त को आचार्य श्री शांति सागर जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर और जैन धर्म के अवदान सहित अनेक विषयों पर देश के ख्याति नाम अनेक आमंत्रित विद्वानों में डॉक्टर शीतलचंद जयपुर ,डॉक्टर श्रेयांश कुमार बड़ौत ,डॉक्टर फूलचंद प्रेमी वाराणसी, प्रोफेसर जयकुमार मुजफ्फरनगर, प्रोफेसर जयकुमार उपाध्याय दिल्ली , प्रतिष्ठाचार्य जयकुमार निशांत टीकमगढ़, डॉक्टर अनुपम जैन इंदौर ,राजेंद्र महावीर सनावद, डॉक्टर आनंद प्रकाश शास्त्री कोलकाता, पंडित सुरेश मारोरा इंदौर ,डॉ सुनील संजय ललितपुर, डॉ ज्योति बाबू उदयपुर ,डॉ पंकज जैन इंदौर, पंडित विनोद रजवास डॉक्टर अनेकांत जैन दिल्ली, डॉक्टर सुरेंद्र भारती बुरहानपुर ,डॉक्टर नरेंद्र टीकमगढ़, प्रोफेसर नलिन शास्त्री दिल्ली डॉक्टर सुधीर शास्त्री बारामती ,महावीर शास्त्री सोलापुर ,डॉक्टर चंद्रकांत ,डॉक्टर सोनल जैन दिल्ली, डॉक्टर आशीष सागर,आदि विद्वान आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के विशाल संघ सानिध्य में आचार्य श्री शांति सागर जी के गृहस्थ अवस्था व्यापार में निस्पृहता,उपसर्ग,उपवास दीक्षाएं,जिनवाणी जैन संस्कृति दिगम्बर मंदिर संरक्षण समाधि ,आचार्य श्री शांति सागर जी की परंपरा सहित अनेक विषयों पर विचारात्मक आलेखों का वाचन किया
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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