में लिख के दे सकता हूँ तुम मरोगे नहीं..? ….अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर जी*पर्यूषण पर्व में संत का जीवन जीकर देखो …पता चलेगा कैसा होता है संतजीवन..क्या होती हे चर्या

धर्म

में लिख के दे सकता हूँ तुम मरोगे नहीं..? ….अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर जी*पर्यूषण पर्व में संत का जीवन जीकर देखो …पता चलेगा कैसा होता है संतजीवन..क्या होती हे चर्या

औरंगाबाद/सोनकच्छ, गाजियाबाद.

.तुम शुरुआत करो परमात्मा अंत करेगा परमात्मा ओर गुरु की भक्ति करते रहो क्योंकि जिसने दांत दिए है वो दाना भी देगा। लेकिन आप का जीवन ऐसा चल रहा है। खाओ पियो ऐश करो ..रहो होटल में ओर मरो हॉस्पिटल में बस यही चल रहा है।अच्छे स्वास्थ व पेट भरने के लिए दो रोटी सब्जी खाना भी बहुत है। लेकिन स्वाद के लिए छप्पन पकवान भी कम पड जायेगे। आज व्यक्ति स्वास्थ के लिए नहीं अपितु स्वाद के लिए खा पी रहा है।

 

 

खिचड़ी दो प्रकार की होती है अगर रसोईघर में बने तो आरोग्यता प्रदान करेगी और दिमाग में पके तो बीमार कर देगी। …..यह बात भारत गौरव अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने ससंघ के साथ श्री तरूणसागरम् पार्श्वनाथ धाम, जिला-गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) के धर्म परिसर में  जीवन के संस्मरण सुनाते उपस्थित भक्तों से कही . उन्होंने पर्वधिराज  पर्यूषण को लेकर कहा कि इस बार पर्यूषण में संत का जीवन जीकर देखो।  दस दिन चटाई पर सोना, उपवास करना समता नहीं होती एकाशन करना, नित्य प्रतिक्रमण, सामयिक, देव वंदना अभिषेक करना ,उबला भोजन बिना नमक का भोजन खाना, मीठे का फल का त्याग देखो तो कैसे संत जीवन जीते है।

 

 

 

 

 

संत के जीवन के लिए कहा गया हे असिधारा अर्थात संत का जीवन तलवार की धार पर चलने जैसा होता है। आज श्रावक धर्म तो कर रहा हे पर विकार मन से नहीं जा पा रहे हैं । आचार्य कहते हे परिणामों की एकाग्रता ही सामायिक होती है विकारों का नाम सामयिक नहीं है।आप मुझ से नहीं हमारी साधना से प्रभावित है लेकिन में आप से प्रभावित नहीं हु। क्योंकि संत का जीवन प्रभावित करने का नहीं प्रकाशित करने का होता है। आप हमारे पास आओगे प्रभावित होकर लेकिन संत आप को प्रकाशित कर के भेजेंगे। जीवन में मरने से पहले एक बार 10 उपवास जरूर करना समता नहीं हो तो जल लेकर करना पर करना जरूर में लिख के दे सकता हु तुम मरोगे नहीं….

 

 

 

 महीने एक बार.. महीने में नहीं तो.. तीन माह में.. उसमें भी नहीं तो.. छः माह में..उसमें भी नहीं तो ..बारह माह में अपने परिवार के साथ कोई भी सिद्ध व अतिशय क्षेत्रों के दर्शन करने जरूर जाना चाहिए और उस स्थान का पानी पीना चाहिए। क्योंकि सिद्ध क्षेत्रों के पानी पीने से रोग दूर हुआ करते है। यह करने से परिवार मिलजुल कर एकसाथ पुण्यार्जन करेगा। और इतना भी नहीं कर सकते तो सो किलो का पत्थर पीठ पर बांध के समुद्र में कूद जाओ तुम्हे जैन होने का कोई अधिकार नहीं है।

 

नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद रोमिल जैन सोनकच्छ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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