दूसरों को नीचा दिखाने के लिए, सांसारिक भोगों के लिए, जो धर्म किया जाता है वह निदान है आचार्य कनकनंदी
भीलुड़ा
विश्व धर्म प्रभाकर आचार्य कनकनंदी गुरुदेव ने भीलुड़ा शांतिनाथ जिनालय में अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि हर जीव उपयोगमय होता है। चेतना की परिणती तथा ज्ञान की स्थिरता को ध्यान कहते हैं। अशुभ त्याग से शुभ मे प्रवृत्त होना शुभ ध्यान है। जितना जितना अशुभ छोडेगे उतना उतना शुभ विचार करेगे। क्रोध मान माया लोभ राग तनाव आदि विभाव पाप है अशुभ है। धर्म करते हुए धन-संपत्ति पुत्र पुत्री प्रसिद्धि आदि चाहना निदान हैं। यह सबसे बड़ा कुज्ञान है। निदान आर्त ध्यान है। निदान मीठा जहर है। निदान पाक फल की तरह खाने में मीठा होता है परंतु शरीर की हत्या कर देता हैं।
वैसे ही निदान अनंत भव तक दुख देकर आत्मा की हत्या करता हैं।
निदान में अहंकार ममकार होता है। मिथ्यात्व गुणस्थान को छोड़कर चतुर्थ पंचम गुणस्थान में शुभ ध्यान होता है। ध्यान के तीन भेद हैं अशुभ ध्यान शुभ ध्यान तथा शुद्ध ध्यान। आर्त ध्यान रौद्र ध्यान अशुभ ध्यान हैं। धर्म ध्यान शुक्ल ध्यान शुभ तथा शुद्ध ध्यान हैं। निदान घीर पाप है। दूसरों को नीचा दिखाने के लिए सांसारिक भोगों के लिए प्रसिद्धि के लिए जो धर्म किया जाता है वह निदान है। आचार्य श्री ने 2000 वर्ष प्राचीन ग्रंथ भगवती आराधना जिसमें 2164 गाथाएं हैं उसकी 1211 गाथा का रहस्य बताते हुए कहा कि मान कषाय के वशीभूत होकर आचार्य उपाध्याय आदि पदों को चाहना भी निदान है। क्रोध के वशीभूत किसी का घात करने का संकल्प मरते समय करना निदान है। जिसके कारण महान तपस्वी साधु भी नरक निगोद में जाते हैं उनका पतन हो जाता है। प्रसिद्धि की चाहत से तीर्थंकर गणधर आचार्य की पदवी चाहना अप्रशस्त निदान है। प्रसिद्धि की चाहत नाम बढ़ाई के कारण भीड़ में बोली बोलना भी निदान है।
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उन्होंने कहा शिष्य के गुणो को देखकर गुरु आचार्य पद प्रदत्त करते हैं। आगम का उदाहरण देते हुए आचार्य श्री ने बताया कि वशिष्ठ मुनिराज ने मरते समय उग्रसेन को मारने का निदान किया था जिसके कारण वह कंस बन गए इसी पुण्य से वह स्वर्ग मोक्ष से प्राप्त कर सकते थे।
विजय लक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
