कर्तव्य निष्ठ मनुष्य साधारण नहीं रहता वह आध्यात्मिक साधक बन जाता है- मुनि श्री प्रमाण सागर

धर्म

कर्तव्य निष्ठ मनुष्य साधारण नहीं रहता वह आध्यात्मिक साधक बन जाता है- मुनि श्री प्रमाण सागर

              भोपाल 

“कर्म” करो लेकिन उस कर्म के प्रति कोई अपेक्षा मत रखो “कर्म सिद्धांत” हमें यही समझाता है” उपरोक्त उदगार मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने विद्याप्रमाण गुरूकुलम् अवधपुरी में प्रातःकालीन धर्म सभा में व्यक्त किये।मुनि श्री ने “कर्म की कसौटी” की बात करते हुये कहा कि पूरी प्रकृति हमें यह पाठ पढ़ाती है कि”कर्म करो परिणाम की चिंता मत करो” लेकिन हम लोग यह पाठ भूल जाते है,उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि “सूरज ऊगता है,और सारे जगत में रोशनी फैलाता है, वह इस बात की चिंता नहीं करता कि कौन मेरा अभिनंदन कर रहा,कौन मेरा उपयोग कर रहा है तथा कोन मेरी उपेक्षा कर रहा है, वह अपने कर्तव्य का पालन करते हुये जगत को आलोकित करता है।

 

 

 

नारायण श्री कृष्ण गीता में कहते हैकि “कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचनम्”कर्म पर ही तेरा अधिकार है,उसके फल पर नहीं,उन्होंने कहा कि आप सभी लोग अपने अपने मन से पूछिये कि हम जो कार्य करते है वह कर्तव्य की भावना से करते है या फल की आकांक्षा से? परिवार में मां बाप का कर्तव्य है,संतान को जन्म दैना उसका लालन पालन कर अच्छे संस्कार देना, *”जब तक व्यक्ति के मन में सहज कर्तव्य की भावना होती है,तो कोई चाह नहीं होती सारे कार्य सहजता से संपादित होते है,लेकिन जब हम उनसे परिणाम की अपने अपेक्षा रखते है,तो बहुत सी उथल पुथल और बैचैनी प्रारंभ हो जाती है* उन्होंने “निष्काम कर्म योग” की चर्चा करते हुये कहा कि जैसे एक किसान खेत में बीज बोते हुये इस बात की चिंता नहीं करता कि फसल आएगी या नहीं? वह तो अपने कर्तव्य भावना से खेत में फसल बोता है,समय पर निंदाई गुड़ाई करता है वह जानता है कि”मेरे हाथ में कर्म है परिणाम नही”और वह निश्चिंत हो जाताहै, समय पर पानी बरसाना या न बरसाना तो प्रकृति के हाथ में है,यह सोचकर वह अपनी तपस्या में कोई कमी नहीं करता, और फसल आई तो वह उसे निष्काम वृति से स्वीकार करता है। मुनि श्री ने कहा कि कोई भी कार्य हो उसे कर्तव्य मान कर करो उसके परिणाम की धारणा लेकर मत चलो

   

 मुनि श्री ने स्वं का उदाहरण देते हुये कहा कि प्रवचन देना मेरा कर्म हे, मैं आप लोगों से यह अपनी अपेक्षा रखूं कि जैसा मैं बोलूं उसका वैसा प्रभाव पड़े,यदी में ऐसा सोचता हुं तो यह मेरी चेतना को अशांत करेगा। “कर्तव्य की भावना से प्रेरित व्यक्ति का जीवन बहुत सहज शांत और संतुलित रहता है,उसके जीवन में सकारात्मकता होती है वह परिणाम को कभी महत्व नहीं देते” उन्होंने कहा इसी प्रकार आपके घर परिवार,आंफिस,व्यापार,या धार्मिक क्षेत्र हो या साधना के क्षेत्र में कही बार ऐसी स्थिति आती है,कि परिणाम आपके अनुकूल नहीं होते,तो आपके मन में उथल पुथल मच जाती है, लेकिन जो कर्तव्य को प्रमुखता देते है,वह परिणाम की चिंता नहीं करते उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन की घटना का उल्लेख करते हुये कहा कि उनके हाथ से राजगद्दी गई, महलों का सुख गया यदि वह परिणाम की चिंता कर बगावत करते तो कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया अपने कर्तव्य का पालन करते हुये वन की ओर प्रस्थान कर गये।

 

 

मुनि श्री ने कहा कि मान लीजिये यदि वह राजगद्दी के लिये अड़ जाते तो क्या वह राम बन पाते?उन्होंने अपने पिता के प्रण की रक्षा करते हुये यह निर्णय लिया “रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई” कर्तव्य की यह भावना प्रत्येक पुत्र के मन में होंना चाहिये

“कर्म की कसौटी कर्तव्य है,परिणाम नहीं” कर्तव्य निष्ठ मनुष्य साधारण नहीं रहता वह आध्यात्मिक साधक बन जाता है।

 

 

उपरोक्त जानकारी मुनिसंध के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया आगामी”28 अगस्त से6  sept तक” दशलक्षण पर्व के अवसर पर श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन होगा इस संस्कार शिविर में प्रतिदिन प्रातःभावनायोग का आयोजन भी रहेगा ओन लाईन रजिस्ट्रेशन बंद हो चुके है, जिन महानुभावों ने रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है वह कमेटी से संपर्क स्थापित कर अभी अपना रजिस्ट्रेशन करा सकते है।

          संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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