न्याय और नीति के साथ चलो,अनीति करना और अनीति को सहना दोनों ही पाप है”- मुनि श्री प्रमाण सागर

धर्म

“न्याय और नीति के साथ चलो,अनीति करना और अनीति को सहना दोनों ही पाप है”- मुनि श्री प्रमाण सागर
भोपाल (अवधपुरी)
“इस धरा पर कुछ ऐसे लोग भी होते है जिनका जन्म तो साधारण होता है,लेकिन उनका जीवन असाधारण होता है,वह व्यक्ति के तरह जन्म तो लेते है,लेकिन व्यक्तित्व बनाकर जीते है,और विभुति की तरह इस दुनिया से विदा लेकर अमर हो जाते है,ऐसी ही विभुतियों को कभी हम श्रीराम,कभी श्रीकृष्ण, कभी ऋषभदेव तो कभी महावीर कहते है” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये।उन्होंने नारायण श्रीकृष्ण के बाल क्रिया से लेकर राजपाट तक की विभिन्न कथाओं के माध्यम से चारित्र चित्रण किया और कहा कि मैं उस कथा की ओर नहीं जाना चाहता लेकिन कथा के माध्यम से जो मुझे चिंतन मिला है उसे में व्यक्त कर रहा हुं, हम लोग महापुरुषों की पूजा तो करते है लेकिन उनके आदर्शों का अनुसरण नहीं करते यदि उनके आदर्शों का अनुसरण करें तो कठिनाइयो में धैर्य निर्णय में विवेक और कर्म में निष्ठा जाग्रत होती है, यदि उनके आदर्शों पर चलें तो एक दिन हम भी उनके अनुसार बन सकते है,इसलिए उनका
अनुष्मरण नहीं,अनुकरण करो पूजा नहीं उनके आदर्शों को स्वीकार करो।

 

 

 

मुनि श्री ने श्रीकृष्ण दो रुप जिसमें प्रेम की अभिव्यक्ति करते हुये मुरलीधर श्रीकृष्ण के रुप में है,तो दूसरे में चक्रधारी श्री कृष्ण के रुप में गहरा संदेश दे रहे है कि “न्याय और नीति के लिये यदि परिवार से भी युद्ध करना पड़े तो कभी पीछे मत हटो मुनि श्री ने उनके जन्म की विषम परिस्थितियों की विवेचना करते हुऐ कहा कि जन्मा बालक जो अपनी मां का दूध भी नहीं पी पाया और उसे छोड़ कर नंदगांव में ग्वाल बालों के साथ पले और बड़े हुये उन्होंने कभी राजकुल का अभिमान नहीं किया तथा ग्वालों के साथ गाय चराने में भी आनंद लिया उनके इस आदर्श से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता वह थे नारायण श्रीकृष्ण।लेकिन ग्वालों के साथ ग्वाल बालक बन कर रहे। मुनि श्री ने कहा कि महान आत्माओं की यही विशेषता होती है वह सबको आत्मसात कर अपने समान बना लेते है,यह उनके सहज प्रेम और आदर्श को दिखलाता है उन्होंने मुरली मनोहर की विशेषता बताते हुये कहा कि गोपियाँ उनकी बासुरी से बड़ी प्रभावित रहती थी श्रीकृष्ण बांसुरी की विशेषता बताते हुये कहते है कि यह भीतर से खाली,अपने अंदर कुछ नहीं रखती,तथा बिना गांठ वाली है, बिना बुलाए कुछ नहीं बोलती,जब भी बोलती मीठा ही बोलती है इसलिये में हमेशा अपने पास रखता हुं,सच्चे अर्थों में ऐसा भाव जिसके मन में होता है वही प्रेम को अभिव्यक्ति देता है! क्या हमारे जीवन में भी वैसा माधुर्य वैसी सरलता आ सकती है? यदि श्रीकृष्ण के यह गुण हमारे अंदर आ जाए तो हमारा जीवन धन्य धन्य हो सकता है।

 

मुनि श्री ने “सुदामा की मित्रता का प्रसंग सुनाते हुये कहा एक ही आश्रम में पले पड़े और बड़े हुये लेकिन एक राजा बना तो दूसरा फकीर” पत्नी के आग्रह पर सुदामा अपने मित्र से मिलने बड़े ही संकोच के साथ जाते है लेकिन जिस प्रकार उनका स्वागत होता है यह आप सभी जानते है,कि कैसे राजा श्रीकृष्ण ने अपने फकीर मित्र को अपने सिंहासन पर बैठाकर उनके चरण धुलाए थे जिसे देखकर सभी रानियाँ एवं राज्य दरबारी आश्चर्य चकित थे उनका यह दृश्य अमीर गरीब की खाई को मिटाते हुये प्रेम और मधुरता को दर्शाता है।मुनि श्री ने कटाक्ष करते हुये कहा कि आजकल तो सगे भाइयों में भी यदि ऐसी असमानता हो तो वह एक दूसरे से मुंह फेर लेते है? उन्होंने कहा कि बातें तो हम बहुत बड़ी बड़ी करते है लेकिन जब रिश्ते निभाने का मौका आता है तो पैसा प्रतिष्ठा और स्टेटर्स आड़े आ जाता है,”रिश्ते तब निभते है जब भावनात्मक लगाव और वास्तविक प्रेम होता है” उन्होंने कहा कि यदि कोई अनीति, अन्याय को कर रहा है,तो उसे बिलकुल बरदाश्त मत करो “अनीति करना जितना पाप है अनीति को सहना भी उतना ही बड़ा पाप है”नारायण श्रीकृष्ण ने कभी अनीति और अन्याय का साथ नहीं दिया और न ही उसके आगे कभी झुके, युद्ध में अर्जुन को आगे किया और स्वं सार्थी बन गये उन्होंने कहा कि आजकल की भाषा में सार्थी मतलब ड्राइवर क्या आप लोग ऐसा कर सकते हो?जीवन की परिपूर्णता का संदेश देते हुये कहा कि हमारे अंदर की जो विवेक पूर्ण बुद्धी है वही हमारे अंदर का कृष्ण है,और जो बुराइयां है वह कालिया नाग और पूतना जैसी राक्षसी प्रवृति है तो अपने अंदर के बुद्धि और विवेक को जगाइये तथा अपने अंदर से काम क्रोध मान माया और लोभ की प्रवृति को भगाइये।

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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