अपने जीवन का मूल्यांकन करो आपने क्या किया और क्या पाया आचार्य श्री 

धर्म

अपने जीवन का मूल्यांकन करो आपने क्या किया और क्या पाया आचार्य श्री 

रामगंजमंडी  

परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के प्रवचन से पूर्व मंगलाचरण अभिषेक जैन लुहाड़िया ने किया संचालन राजीव बाकलीवाल ने किया।

महाराज श्री ने कहा भूख सबको लगती है लेकिन भोजन करने का तरीका सबका अलग अलग होता है कितने ऐसे समय, कितने घंटे, कितने दिन आपके पास आते हैं हैं की आप लोगों को जड़ से उखाड़ना चाहते हैं। उस समय जन्म लेने वाले परिणाम काले होते है। आपने तो कह दिया देख लूंगा बस चलता तो छोड़ता नहीं तुमने ऐसा सोचकर पूरी आत्मा पर कालिख पोत दी।

 

 

 

     सबको याद है जब आप पढ़ते थे तो मूल्यांकन होता था हर महीने टेस्ट होता था बच्चों का मूल्यांकन होता था कॉपी बनती थी जिसमें माहभर बाद कुछ प्रश्न दिए जाते थे और उन प्रश्नों को हल करना पड़ता था आज भी टेस्ट इसलिए होते है यह पता पड़ता है कि हमने क्या सीखा है। लोगो का पूरा जीवन निकल जाता है लेकिन वो मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं । 5 वर्ष 10 वर्षों में मैंने क्या पा लिया है और क्या खो दिया है यह मूल्यांकन होना ही चाहिए कि इन 10 वर्षों में क्या किया हमने इसका मूल्यांकन नहीं किया उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पड़ोसी का मूल्यांकन करना बड़ा अच्छे तरीके से आता है। यदि आपको कोई वस्तु मिल जाए बस तो ऐसी होनी चाहिए वस्तु वैसी होनी चाहिए उसका मूल्यांकन आप तुरंत करते हैं। खुद का मूल्यांकन करने की हमने कोशिश ही नहीं की हम पूरे काले हो गए लेकिन हम तो आईने सामने देखकर चेहरे को संभालते है यह तो गोरा है गोरे होने से आत्मा के काले होने से कोई फायदा नहीं चेहरा तो काला भी चल जाता है लेकिन आत्मा गोरी होनी चाहिए।

 

हमने भाव इतने निम्न बना लिए की हम हिंसा के लिए उतारू हो गए हम इसे छोड़ेंगे नहीं जड़ से उखाड़ कर फेक देंगे।उन्होंने कहा डांटना मारना हर समय बुरा नही होता आत्मा किसी भी समय हिंसा को स्वीकार नहीं करती ऐसे विचार समझदारी धार्मिकता एवं धार्मिक विचारों में ऐसा हो सकता है। हम किसी को जब भी डाटे गुस्सा करे तब यह प्रयोजन होना चाहिए हमारे अंदर कषायो की मंदता होनी चाहिए। उन्होंने कहा मंदिर विशुद्धता का स्थान है आप जब अपने भीतर देखते हैं तो जो है वह होना नहीं चाहिए जो होना चाहिए वह हो नहीं रहा है। मंदिर विकल्पों के विराम स्थान होता है। मंदिर अशुभ भावना के विसर्जन का स्थान होता है। मंदिर में बैठकर विकल्पों को स्थान दे रहे हैं तो शुभ लेश्या की उम्मीद नहीं की जा सकती। शुभ लेश्या में मंदिर आएगे तो अध्यात्म आनंद की अनुभूति होगी।

     

 

 

 जैनों के रक्त का परीक्षण कराया जाए तो रक्त क्षत्रियों जैसा है। 

आचार्य श्री ने कहा जैन क्षत्रिय है यदि जैनियों के रक्त का परीक्षण कराया जाए तो रक्त क्षत्रियों जैसा है। हाथ में कलम नहीं तलवार है हिंसा के लिए नहीं रक्षा के लिए आदिनाथ महाराज ने जब तलवार सौंपी तो कहा था रक्षा करना हिंसा नहीं करना। तुम उसी कुल के हो जिसे आदिनाथ ने तलवार सोपी थी और रक्षा का भार सौंपा था। लेकिन आप बनियों की संगति में फस गए कमजोर हो गए मेर बस का नहीं है अपने आप को क्षत्रिय समझ कर देखो धर्म ध्यान की वृद्धि हो जाएगी अशुभ की हानि हो जाएगी शुभ में चले जाओगे।

    अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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