शील का पालन मर्यादा का पालन है वही शील का उल्लंघन मर्यादा का उल्लंघन है प्रमाण सागर महाराज
भोपाल (अवधपुरी)
“शील” का पालन” मर्यादा का पालन है,वही शील का उल्लंघन मर्यादा का उल्लंघन है”उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने अवधपुरी स्थित विद्या प्रमाण गुरुकुलम् में प्रातःकालीन धर्म सभा में व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि आजकल युवक एवं युवतियों द्वारा”स्वतंत्रता के नाम पर लव इन रिलेशनशिप जैसे अविवेक पूर्ण कार्य किये जा रहे है,जो कि भारतीय सभ्यता के प्रतिकूल है, उस पर प्रहार करते हुये मुनि श्री ने कहा कि संस्कारों की कमी और भौतिकता के आकषर्ण में व्यक्ती चारित्रिक रुप से कमजोर होकर पतन की ओर चला जाता है,इससे वह समाज की नजरों में तो गिरता ही है, स्वयं की नजरों से भी गिर जाता है।

“नदी” यदि अपनी मर्यादा का उल्लंघन करती है,तो वह तबाही मचाती है,और यदि अपनी सीमा में रहती है तो जीवन को आगे बढ़ाती है।, जिसके जीवन में कोई मर्यादा नहीं, आचरण में अनुशासनहीनता,जिसकी इंद्रियाँ बे लगाम घोड़े की तरह भागती हों,जिसका मन पूरी तरह मनमानी पर उतर आया हो,ऐसे युवक “शील” का उल्लंघन कर हमारी संस्कृति को खंडित कर रहे है।उन्होंने कहा कि “अभिव्यक्ति” की आजादी का अर्थ यह नहीं है,कि खुलकर जिओ और समाज की सारी मर्यादाओं को तार तार करके रख दो,जब ऐसे व्यक्तियों को समाज पसंद नही करती और उनसे दूर भागती है, तो वह उपेक्षा का शिकार होकर नैतिक पतन और अपराधों की ओर अग्रसर हो जाता है,इस बुराई से बचने का उपाय बताते हुये कहा कि “आत्मनियंत्रण” ही सबसे बड़ा उपाय है।
“भावनायोग” के माध्यम से इस कमजोरी को दूर किया जा सकता है।
मुनिसंघ के प्रवक्ताअविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया प्रवचन के उपरांत पांच मिनट का भावनायोग कराया और कहा कि” मनुष्य जीवन केवल शरीर और बुद्धि का खेल नहीं है,उसकी आत्मा उसकी सबसे बड़ी पहचान है “भावना”यदि निर्मल हों तो साधारण जीवन भी दिव्य बन सकता है,और “भावना” यदि विकृत हो,तो सारे संसाधनों के जीवन दिशा हीन हो जाता है”* भावनायोग के चार चरण “प्रार्थना” में संयम, नैतिकता और मर्यादा की सीमा में रहने की बात कही गई वही दूसरे चरण में “प्रायश्चित” में शिथिलता और मर्यादा के उल्लंघन, दूसरों के हितों में बाधक, उनको कष्ट पहुंचाने तथा उनकी स्वतंत्रता खंडित के लिये पश्चाताप एवं निंदा करते हुये अविवेक और अमर्यादित जीवन से जिस जीव को कष्ट पहुंचा हो उन सभी से क्षमा याचना करते हुये भविष्य में मर्यादित,संयमित जीवन जीने के संकल्प के साथ आत्मरुपांतरण की बात करते हुये शुद्ध आत्मतत्व की बात कही गई।
इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज एवं समस्त छुल्लक मंचासीन थे। कार्यक्रम का संचालन बाल ब्र. अशोक भैया लिधोरा ने किया।इस अवसर पर सागर,जयपुर, दिल्ली, आगरा,के श्रद्धालु मौजूद रहे।
अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
