उदवेग” ऐसा तीव्र होता है जो हरे भरे जीवन को नष्टभृष्ट कर देता है प्रमाण सागर महाराज
भोपाल उदवेग” ऐसा तीव्र होता है, जो हरे भरे जीवन को नष्टभृष्ट कर देता है,यह अचानक बड़ी तेजी के साथ उभरता है,जिससे “विवेक” छिटक कर दूर भाग जाता है, उपरोक्त उदगार मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने प्रातःकाल धर्म सभा में व्यक्त किये।मुनि श्री कहा कि उदवेग की असली जड़ अपने विचारों में है,देखिये कही ये विचार नकारात्मक तो नहीं? यदि आप अपने विचारों की शुद्धि की ओर ध्यान देंगे तो यह तय मानकर के चलना कि आप अपने अंदर के उदवेग को रोकने में सक्षम हो जाएगे, मुनि श्री ने सलाह देते हुये कहा कि कोई घटना घटी और आपको उदवेग आ रहा है तो कुछ पल ठहरिये और थोड़ा समय दीजिए आप देखेंगे कि विचारों में जो नकारात्मकता का उदवेग आया था वह सकारात्मकता में बदल गया मुनि श्री ने कहा कि सारे विकारों का मास्टर माइंड तो हमारा मन है,जो हमारे भीतर मौजूद है,उस मास्टरमाइंड मन को साध लिया तो वह आपका तारक बन जाएगा और यदि “मन” पाप रुपी कषाय में चला गया तो वही “मन” मारक भी बन जाता है,मुनि श्री ने “मन” को साधने में “भावनायोग” को साधने का अभ्यास कर लें तो किसी भी प्रकार का विकार हम पर हांवी नहीं हो सकता”
उन्होंने कहा कि “भावनायोग” के प्रथम चरण में भगवान से प्रार्थना करो कि हे प्रभु मुझे ऐसी दृष्टि दो कि में अपने उद्देश्य को साथ रख सकूं मेरी प्रतिक्रियाए संयत रह सके में सहजता और शांती का धनी रह सकूं मेरे मन में शांति हो,मेरे चित्त में स्थिरता हो तथा मेरे भावों में निर्मलता हो, अपनी दृष्टि भावनायोग के वाक्य मै सहज रहूं- मै शांत रहुं- में संयमित रहुं- सकारात्मक रहुं” इन चार वाक्यों को बार बार दोहराओगे तो आपकी अंतस चेतना में संस्कार बनेंगे और वही संस्कार आपके उदवेग को शांत करने में निमित्त बनेंगे जैसे उफनते हुये दूध में चुल्लू भर पानी उसके उदवेग को शांत कर देता है जब कभी भी मन में उफान आये तो यह प्रेक्टिकल आप लोग करके देखना जीवन की सारी नकारात्मकता दूर हो जाएगी उन्होंने कहा कि इसका अभ्यास आज ही से शुरु कीजिये देखना आपके जीवन का रुपांतरण हो जाएगा।
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उन्होंने कहा दूसरे चरण में “प्रतिक्रमण” का उल्लेख करते हुये कहा कि विचार कीजिये कि किस किस पर मुझे उदवेग आया और मेंने किस किस के ऊपर अपनी ओर से नकारात्मक प्रतिक्रिया की उन सभी से मन ही मन क्षमा मांग लेना यदि यह भाव आपके मन में जाग गया तो उदवेग के प्रति आपका मन जागरूक हो उठेगा उन्होंने भावनायोग के तीसरे चरण की चर्चा करते हुये कहा कि संकल्प लो कि मुझे सहज रहना है, शांत रहना है, संयम रखना है, तथा सकारात्मक रहना बस यही चार बिदुओं कोअपनी अंतस की चेतना में स्थापित कर लिया तो आप समता की मूर्ति बन सहजता, शांति,संयम, और सकारात्मकता से भरे रहेंगे।
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प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया की मुनि श्री पांच मिनट का भावनायोग कराया एवं सभा के अंत में आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर महाराज, सहित मुनिसंघ की पूजा संपन्न हुई27 जुलाई रविवार को भावनायोग का विशेष अभ्यास प्रातःकाल होगा एवं भावनायोग की नई “पुस्तक फील टू हील” पर प्रवचन होगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312







