स्थापना कलश की बोली से साधु संतो के बड़े व छोटे होने का आकलन कितना उचित*

धर्म

*स्थापना कलश की बोली से साधु संतो के बड़े व छोटे होने का आकलन कितना उचित*

     वर्तमान समय में जैन समाज में एक नई अवधारणा का विकास हो रहा है उस अवधारणा में साधु संतों के भी छोटे और बड़े होने का आकलन किया जा रहा है।उसी से उनकी महत्वता भी सिद्ध की जा रही है। ऐसा क्या है जिसके माध्यम से यह तय हो रहा है कि *कौन साधु छोटा, कौन साधु बना* देखा जाए कलश स्थापना समारोह में प्रथम कलश की बोली लगने से ही साधु के छोटे और बड़े का अनुमान श्रावकों के द्वारा लगाया जा रहा है। कभी भी चर्चा होती है तो केवल यही चर्चा होती है की कलश की बोली कितने की गई और यदि किसी साधु की कलश की बोली कम राशि की जाती है तो फिर अपने मन मस्तिष्क में उसकी उतनी ही स्तर की छवि श्रावकों द्वारा स्थापित कर ली जाती है।

 

 

      यह सब कितना उचित है यह तो मैं नहीं जानता? 

   लेकिन क्या यह चर्चा करना सामाजिक,धार्मिक व शास्त्रों के दृष्टिकोण से उचित है? 

     क्या संत भी धन के तराजू में तोले जा सकते हैं? 

    क्या संतों की तप त्याग और तपस्या को किसी भी प्रकार के सांसारिक वैभव से तुलना की जा सकती है?

   क्या जितने बड़े धनाढ्य भक्त उतने ही बड़े सन्त ?

 

   प्रश्नों की लड़ी सी मन को व्याकुल कर रही है किंतु जवाब शायद नही मिल पाए और मिल भी पाए तो परिणाम सिर्फ शून्य ही होगा। खैर एक तरफ अपरिग्रह का सिद्धांत पालन करने वाली जैन समाज, कितने बड़े परिग्रह को अपने मन में स्थान देकर बैठी है। इसकी गणना होने वाली कलश स्थापना की बोली की चर्चा से प्रकट हो जाती है।

     हम सब किस ओर जा रहे हैं? क्या हमारा कर्तव्य है? क्या हमारा दृष्टिकोण होना चाहिए? इन सब तथ्यों पर भी अत्यधिक चर्चा मंथन की आवश्यकता है। बात कड़वी है लेकिन कड़वी गोली ही सही इलाज करती है। हो सकता है मेरी बात से आप सहमत ना हो और टीका टिप्पणी करने लगे लेकिन मैं पूर्व में ही आप सबसे क्षमा प्रार्थी हूं किंतु विचार अवश्य कीजिए और अपने आसपास होने वाली चर्चाओं पर ध्यान दीजिए क्या यही सब घटित हो रहा है। इन सब से उभरने की आवश्यकता है।

    आवश्यकता है कि वर्षा योग के दौरान हम स्वयं को कितना बदल पाए, स्वयं की दिशा और दशा में कितना परिवर्तन कर पाए, कितने हम धर्म के मर्म को समझ पाए ,कितना समय हम साधु संतों के साथ व्यतीत कर पाए,यह सब महत्वपूर्ण है ना की कलश की बोली कितनी राशि की गई। क्षमा के साथ सादर जय जिनेंद्र

*संजय जैन बड़जात्या कामां*

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