आचार्य श्री 108 विराग सागर का प्रथम समाधि दिवस मनाया जाएगा 

धर्म

आचार्य श्री 108 विराग सागर का प्रथम समाधि दिवस मनाया जाएगा 

   रामगंजमंडी 

   परम पूज्य आचार्य श्री 108 विराग सागर महाराज का प्रथम समाधि दिवस आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य में शुक्रवार की बेला में मनाया जाएगा।

 

 

जिसमें प्रातः बेला में श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा उपरान्त 1008 जिन सहस्रनाम मंत्राभिषेक किया जाएगा। इसके उपरांत आचार्य श्री 108विराग सागर महाराज का गुरु पूजन किया जाएगा जिसके लिए विशेष गुरु मंदिर बनाया गया इस कार्यक्रम में विशेष थाल सजाकर अष्ट द्रव्यों से पूजन किया जाएगा जिसके लिए विशेष तैयारी की जा रही है। इसी अनुपम बेला में विनयांजलि दी जाएगी इसके उपरान्त समस्त मुनिराज एवम आचार्य श्री के द्वारा गुरु के प्रति विनयाजली होगी 

      आचार्य श्री विराग सागर महाराज का परिचय 

 आचार्य विराग सागर का जन्म 2 मई 1963 को दमोह जिले के पथरिया में हुआ था। बचपन से ही सूर्य की तरह चमक और बुद्धि के धनि बालक अरविंद (बचपन का नाम) ने पथरिया के ही शासकीय प्राथमिक शाला में पांचवीं तक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद 1974 में 11 वर्ष की आयु में ही उन्होंने वैराग्य का रास्ता धारण किया और पिता कपूर चंद और मां श्यामा देवी जैन के आाशीर्वाद पर वह कटनी शांति निकेतन जैन संस्कृत विद्यालय में पढऩे के लिए चले गए। जहां धार्मिक, शास्त्र और लौकिक शिक्षा से मेट्रिक पास की। इसके बाद वह शास्त्री बन गए और साधु, संतों के साथ रहते हुए अरविंद का का ज्ञान और बढ़ता गया। यही समय था कि उन्होंने जिन शासन में अपना योगदान देने का मन बना लिया था।

धर्म की राह पर निकले अरविंद ने फिर घर की ओर नहीं देखा। यही वजह थी 1980 में वह समय आया जब उनकी शिक्षा, त्याग और ज्ञान को गुरु का आशीर्वाद मिला। तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर ने मप्र के शहडोल जिले के बुढ़ार में अरविंद शास्त्री को 20 फरवरी 1980 को क्षुल्लक दीक्षा दी। तब अरविंद 17 साल के ही थे। साथ ही उन्हें नई पहचान क्षुल्लक पूर्णसागर के रूप में मिली। गुरू से क्षुल्लक दीक्षा के बाद उनकी तपस्या और बढ़ गई। जिसे देख आचार्य विमलसागर महाराज ने 9 दिसंबर 1983 यानि 20 वर्ष की उम्र में उन्हें मुनि दीक्षा दी और यहीं सें उनका नाम मुनि विराग सागर हुआ। विराग सागर को मुनि दीक्षा महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मिली थी। मुनि रहते विरागसागर ने त्याग और तपस्या बढ़ाई। अनेक जगहों पर विहार कर धर्म प्रभावना बढ़ाई। जिसे देख गुरू आचार्य विमलसागर ने 8 नवंबर 1992 को मप्र के छतरपुर जिले के द्रोणागिरी में मुनि विरागसागर को आचार्य पद जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी। तब उनकी उम्र महज 29 वर्ष ही थी।

बुंदेलखंड के प्रथम आचार्य ऐसे बने गणाचार्य

29 की उम्र में ही आचार्य पद की जिम्मेदारी मिलने के बाद विराग सागर ने जैन संस्कृति की धर्म प्रभावना को ऐसा बढ़ाया कि हर युवा उनसे प्रभावित होने लगा। न सिर्फ बुंदलेखंड, मप्र बल्कि उप्र, विहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों में विहार करते हुए धर्म पताका फहराया। इस दौरान आचार्य विरागसागर ने संघ में 94 मुनियों, 73 आर्यिकाओं, 5 ऐलक, 23 क्षुल्लक, 32 क्षुल्लिका दीक्षाएं देकर युवाओं को मोक्ष मार्ग की और प्रशस्त किया। इस तरह करीब 222 साधु, साध्वियां विराग सागर के बड़े संघ में हैं। इसके अलावा 110 ऐसे वृद्धजनों को दीक्षा देकर संलेखना की ओर ले गए, जिनका जीवन पूरी तरह धर्म में व्यतीत रहा हो। आचार्य विराग सागर ने अपने शिष्यों के ज्ञान की परख करते हुए बीच में ही 9 मुनियों को आचार्य पद दे दिया था। इसीलिए बुंदलेखंड के प्रथम आचार्य विराग सागर को अब गणाचार्य की उपाधि मिल चुकी थी।

       अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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