जुनून हो तो मंजिल कदम चूमती है, प्रमाद और आलस्य खुद दूर हो जाते हैं : आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज
ढोलना (जिला धार)।
“जुनून होना चाहिए मंजिल तक जाने का, फिर देखो आलस्य और प्रमाद को भनक भी नहीं लगेगी और मंजिल आपके कदम चूमेगी।” यह प्रेरणादायी संदेश अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए दिया।
आचार्य श्री ने कहा कि प्रमाद (लापरवाही) के कारण मनुष्य अपने कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक खो देता है। परिणामस्वरूप वह अपनी शक्ति, समय और ऊर्जा को गलत दिशा में व्यय कर देता है तथा जीवन के वास्तविक उद्देश्य से दूर हो जाता है। उन्होंने कहा कि मानव जीवन की सफलता मन के उत्साह, सकारात्मक सोच और अटूट जुनून पर निर्भर करती है।


उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक बच्चा यदि माता-पिता के डर से पढ़ता है और दूसरा अपनी रुचि एवं खुशी से पढ़ता है, तो दोनों की पढ़ाई और उपलब्धियों में जमीन-आसमान का अंतर होता है। इसी प्रकार जब व्यक्ति अपने जीवन में सत्कर्म और सद्संकल्प को अपनाता है, तभी वह अपने जीवन मूल्यों को सार्थक कर पाता है।
आचार्य श्री ने कहा कि सत्कर्म और सद्संकल्प से शरीर की सभी इंद्रियां भी सहयोगी बन जाती हैं। इंद्रियों के सकारात्मक सहयोग के बिना किसी भी कार्य की सिद्धि संभव नहीं है। जब मन और इंद्रियां सही दिशा में कार्य करती हैं, तब व्यक्ति का चिंतन आत्मकल्याण और लोकमंगल की ओर अग्रसर होता है।

उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में पैर कभी गलत राह पर नहीं बढ़ते, हाथ अनुचित कार्यों में नहीं लगते, नेत्र बुरी दृष्टि नहीं डालते, वाणी मधुर और प्रेरणादायी बन जाती है तथा कान भी नकारात्मक और कलुषित विचारों को स्वीकार नहीं करते। अंततः मन इन सभी इंद्रियों का मार्गदर्शक बनकर जीवन को श्रेष्ठ दिशा प्रदान करता है।

आचार्य श्री ने अपने प्रवचन के समापन में कहा कि “मन ही इंद्रियों का मुख्य पावर हाउस है। यदि मन सकारात्मक, जागरूक और लक्ष्य के प्रति समर्पित हो जाए, तो सफलता निश्चित है।”
प्राप्त जानकारी: नरेंद्र अजमेरा, पीयूष कासलीवाल (औरंगाबाद)
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी।
