वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज की स्वस्तिधाम तीर्थ पर गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने की आगवानी साधुओं में आचार्य शांति सागर जी के और तीर्थ में सम्मेद शिखर जी के दर्शन सभी श्रावक श्राविकाओं को करना चाहिए
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
जहाजपुर
प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री 108शांतिसागर जी महाराज की परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री108 वर्धमान सागर जी महाराज की अगवानी आचार्य श्री 108शांति सागर जी महाराज छाणी परंपरा की भारत गौरव गणिनी आर्यिका105 श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने संघ सहित जहाजपुर आगमन पर की। माताजी ने आचार्य वंदना ओर आचार्य भक्ति परिक्रमा लगाकर की। पूज्य आर्यिका 105 श्री स्वस्तिभूषण माताजी अन्य साधुओं एवम प्रियंका दीदी एवं किशोर जैन इंदौर ने जहाजपुर मंदिर आगमन पर आचार्य श्री के 9 प्रकार के रत्नों केशर से चरण प्रक्षालन किए।

इस अवसर पर आचार्य श्री 108वर्धमान सागरजीमहाराज ने प्रवचन में,दर्शन ,अभिषेक ,पूजन ,आहारदान, सांसों का महत्व ,वास्तविक दान ,समवशरण की रचना, दर्शन का महत्व ,पंचकल्याणक का महत्व ,स्वयं के चिंतन ,ब्यावर में आचार्य शांति सागर जी के चातुर्मास ,साधु के साधु के प्रति विनम्रता और विनय भाव, चक्रवर्ती शब्द का महत्व, जहाज का वास्तविक अर्थ ,संस्कृति और धर्म की रक्षा में आचार्य शांति सागर जी के योगदान ,जीवन में श्वास का सदुपयोग आदि पर विस्तृत उपदेश दिया।राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने उपदेश आगे बताया कि तीर्थंकर चक्रवर्ती एक समय में एक होते हैं। चक्रवर्ती 6 खंड पर विजय प्राप्त करते हैं प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने चारित्र के 6 खण्डों पर विजय प्राप्त की थी इसीलिए उन्हें चक्रवर्ती की उपमा दी गई उनके जीवनकाल में अन्य कोई मुनि आचार्य चक्रवर्ती नहीं हुए।श्री शांति सागर जी ने धर्म ओर संस्कृति की रक्षा की। साधु दूसरे साधु के प्रति विनम्रता और भक्ति प्रदर्शित करते हैं साधुओं में आचार्य श्री शांति सागर जी ओर सिद्ध क्षेत्रों में श्री सम्मेद शिखर जी के दर्शन सभी को अवश्य करना चाहिए। धर्मात्मा सर्व को प्रेरणा और उपदेश देते हैं ।जीवन में कितनी सांसे बची है उसे सांसों को धर्म में लगाना चाहिए। तीर्थ क्षेत्र संयम साधना के स्थल है खाने पीने आमोद प्रमोद के स्थल श्रावकों ने बना दिया।इससे धर्म नहीं होता आपके विचारों क्रियाओं से हमारे तीर्थ क्षेत्र सुरक्षित नहीं हैं जीवन में धर्म को अपना कर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। यह मंगल देशना पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने स्वस्ति धाम जहाजपुर में आयोजित धर्म सभा में प्रगट की। आचार्य श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि न्याय और नीति से अर्जित द्रव्य को दान देना चाहिए दान धर्म कार्य में देना चाहिए।समवशरण मंदिर धर्म का प्रतीक है जिन बिंब दर्शन से सम्यक ज्ञान होता है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में सूर्य मंत्र से प्रतिमाओं में देवत्व के गुण आरोपित किए जाते हैं। जिनालय जिन बिंब के दर्शन श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए सभी को 5 मिनट स्वयं के बारे में चिंतन करना चाहिए भगवान की प्रतिमा संदेश देती है।
आचार्य श्री ने बताया कि 40 वर्ष पूर्व हमने जहाजपुर गांव में भगवान श्री नेमिनाथ और श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान के दर्शन किए थे।आचार्य श्री ने बताया कि ब्यावर राजस्थान में प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी ओर आचार्य श्री शांति सागर जी छाणी ने एक साथ चातुर्मास किया था।
इसके पूर्व गणिनी आर्यिकाश्री स्वस्तभूषण माताजी ने सम्यक दर्शन, ज्ञान , चारित्र की विवेचना की। देव शास्त्र गुरु वीतरागी और होते हैं उनके प्रति दृढ़ श्रद्धा रखना चाहिए। तत्वार्थ सूत्र के छठे अध्याय में विवेचना है की सच्ची श्रद्धा सम्यक दर्शन है। माताजी ने बताया कि सिद्धि और प्रसिद्धि में अंतर है लौकिक ज्ञान से प्रसिद्धि मिलती है किंतु रत्नत्रय धर्म से सिद्धि प्राप्त होती है माताजी ने आचार्य श्री के प्रशंसा कर बताया कि कल चतुर्दशी को आचार्य श्री सहित सात साधुओं के उपवास थे उसके बावजूद संघ ने प्रतिकूल मौसम में बिहार किया।
27 जून को 36 वा आचार्य पदारोहण जहाजपुर में मनाया जाएगा।अनेक नगरों से भक्त चातुर्मास का पुनः निवेदन करेंगे। आचार्य श्री 27 जून को वर्ष 2025 के चातुर्मास स्थल की घोषणा करेंगे

राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



