जन्मकल्याणक पर राजसी ठाट बाट के साथ निकली भव्य शोभायात्रा, गूंजे बधाई गान ,1008 कलशों से हुआ जन्माभिषेक
पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण छोड़ भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देवे- मुनि अमित सागर
देवपुरा ।
देवपुरा में चल रहे आदिनाथ जिन बिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में मंगलवार को मुनि अमित सागर महाराज के सानिध्य मे जन्मकल्याणक धूमधाम से मनाया मनाया गया ।प्रातः श्री जी का पंचामृत अभिषेक पूजन पश्चात प्रतिष्ठाचार्य धर्मचंद शास्त्री के निर्देशन में तीर्थंकर बालक का जन्म अवतरण , सोधर्म इंद्राणी द्वारा प्रथम दर्शन, तीर्थंकर माता को चिर निद्रा में सुलाकर तीर्थंकर बालक को प्रसूति गृह से बाहर लाना,सोधर्म इन्द्र द्वारा 1008 नेत्रों से तीर्थंकर बालक का दर्शन करना आदि प्रभू जन्म दृशो का जीवंत मंचन हुआ। प्रवक्ता अनिल स्वर्णकार ने बताया कि जन्मकल्याणक के अवसर पर कार्यक्रम स्थल से राजसी ठाट बाट के साथ भव्य शोभायात्रा निकली। शोभायात्रा में हाथी ,घोड़े ,बग्गियों में इंद्र -इंद्राणीया, बैंड बाजो की भक्तिमय स्वर लहरियों पर थिरकते युवक -युवतियां,ऐरावत हाथी पर आरूढ़ तीर्थंकर बालक को लिए हुए सोधर्म इन्द्र- इंद्राणी के साथ अपार जन सैलाब महोत्सव की भव्यता को दर्शा रहा था। शोभायात्रा के सुमेरू पर्वत स्थित पांडुक शीला पर पहुंचने पर तीर्थंकर बालक का 1008 कलशों से जन्माभिषेक किया गया। दोपहर में अयोध्या नगरी में राजा नाभिराय के दरबार ओर चारों तरफ बधाई गान गुंजायमान हुए। इस अवसर पर मुनि अमितसागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि आधुनिक युग में तीर्थंकरों के जन्म कल्याणक महोत्सव को हमें समझने की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति काटना नही, जोड़ना सिखाती है , जन्मदिन पर मोमबत्तियां बुझाने की बजाय दीपक जलाने चाहिए ।तीर्थंकरो का जन्म निश्चित ही हमारे लिए एक महान अवसर है ताकि हम उनके जीवन पर नजर डालकर उनके आदर्शों पर चलकर अपने जन्म को भी सार्थक बना सकें। मुनिश्री ने युवा पीढ़ी ओर अभिभावकों को पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण नही करने की सीख देते हुए विदेशी संस्कृति की गलत परम्पराओ को छोड़ कर भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने का आह्वान किया ।शाम को सौधर्म इन्द्र का तांडव नृत्य ,तीर्थंकर बालक को पालना झूलाना ,तीर्थंकर प्रभु की बाल क्रीड़ाये आदि दृश्यों का मंचन हुआ। संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमंडी
