आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज का 12 जून को विदिशा नगर में होने जा रहा है मंगल प्रवेश
विदिशा ः
इंदौर में हुये पट्टाचार्य महोत्सव के उपरांत चर्या शिरोमणि आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज का विदिशा नगर में प्रथम आगमन हो रहा है,यह विदिशा नगर का सौभाग्य है कि यहा से मुनि अवस्था से लेकर आचार्य अवस्था तक लगभग 12 बार विदिशा नगर में आपका पदार्पण हुआ तथा पट्टाचार्य के रुप में आपका प्रथम नगर आगमन दिनांक 12 जून गुरुवार एकादशी के दिन हो रहा है।
उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज को तत्वों का इतना गहरा चिंतन है,कि उनको जिनवाणी पुत्र के नाम से जाना जाता है। आपने श्री शांतिनाथ दि. जैन मंदिर स्टेशन पर सन्2004-2005 में समयसार तथा प्रवचन सार की 
वाचना की आचार्य श्री का संक्षिप्त परिचय देते हुये बताया भिण्ड जिले के ग्राम रुर में आपका श्रावक श्रैष्ठी श्री रामनारायण एवं मां श्री मति रत्तीवाई की कोख से जन्म लिया बचपन के लला राजेंद्र जी 7 वर्ष की अल्पआयु से ही देव शास्त्र और गुरु के प्रति समर्पण था तथा स्व प्रेरणा से रात्री भोजन एवं अभक्ष्य बस्तुओं का त्याग कर दिया तथा आठ वर्ष की आयु आते आते आपने अष्ट मूल गुणों को धारण करते हुये सप्तव्यसन का भी त्याग कर दिया था आपकी लोकिक शिक्षा कक्षा नौ तक ही रही।
जब आप 17 वर्ष के हुये तो सन्1988 भिण्ड नगर में आचार्य श्री विरागसागर महाराज का चातुर्मास चल रहा था अपनी बहन के घर से आचार्य श्री का प्रतिदिन सानिध्य पाया और बरसो ग्राम के जैन मंदिर में आजीवन ब्रहमचर्य व्रत ले लिया, 11अक्टूबर 1989 को 18 वर्ष की उम्र में आपकी क्षुल्लक दीक्षा यशोधरसागर नामकरण से हो गई एवं दो वर्ष तक लगातार तपस्या में लीन रहकर मुनिचर्या का पालन किया तो आचार्यश्री विरागसागर महाराज ने 19 जून 1991 को पन्ना नगर में आपको ऐलक दीक्षा प्रदान की एवं छै माह पश्चात दिनांक 21 नवंबर1991 को श्रैयांसगिरी में आपकी जैनेश्वरी दीक्षा संपन्न हो गई ।



इस प्रकार लला राजेंद्र से मुनि श्री विशुद्ध सागर महाराज की यह यात्रा आपने मात्र 20 वर्ष की आयु में पूर्ण कर ली मुनि अवस्था में आपकी गहन साधना और जिनवाणी का गहराई के साथ अध्यन किया आपकी प्रवचन शैली युवकों को मंत्र मुग्ध करती है।
2004- 2005 में आपका विदिशा नगर में प्रथम चातुर्मास हुआ और लगातार 9 माह तक समयसार एवं प्रवचन सार जैसे ग्रंथ पर वाचना संपन्न हुई 15 वर्ष 6 माह बाद ओरंगाबाद में समाधिस्थ आचार्यश्री विरागसागर महाराज ने आचार्य पद से विभूषित किया मां जिनवाणी के आज्ञाकारी एवं मुनिचर्या का निर्विवाद पालन करने पर आपको चर्या शिरोमणि की उपाधि मिली एवं नमोस्तु शासन जयवंत हो के स्वर गुंजे आपने अपने संघ को मात्र बाल ब्रह्मचारीयो तक ही सीमित रखा।
आचार्य बनने के उपरांत युवा मुनियो को लगातार दीक्षा दी लगभग 70 मुनि आपसे दीक्षित हो चुके है जो कि भारत के विभिन्न प्रांतों लगातार धर्म की प्रभावना कर रहे है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

