महापौर मालती राय ने किए गुरुकुलम में दर्शन और गुरुचरण की वंदना पंचकल्याणक महोत्सव में गूंजा “जन्म नहीं – और जन्मकल्याणक है” का भाव

धर्म

महापौर मालती राय ने किए गुरुकुलम में दर्शन और गुरुचरण की वंदना पंचकल्याणक महोत्सव में गूंजा “जन्म नहीं – और जन्मकल्याणक है” का भाव
भोपाल
पंचकल्याणक महोत्सव की दिव्यता ने आज भोपाल की धरा को अध्यात्म से सराबोर कर दिया। प्रभु के जन्मकल्याणक के शुभ अवसर पर जब मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज ने अपनी वाणी से अमृत वर्षा की तो उपस्थित जनसमूह भावों की वर्षा में भीग उठा।

 

 

जन्मोत्सव की अभिव्यक्ति करते हुए मुनिश्री ने कहा, “भगवान का जन्म सामान्य नहीं होता — वह स्वयं के लिए नहीं, अपितु समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए होता है। यह केवल एक जन्म नहीं, जन्मकल्याणक है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि सामान्य व्यक्ति का जन्म उसके परिवार में होता है, परंतु भगवान के जन्म पर तीनों लोकों में मंगल की लहर दौड़ती है।

जन्म में जश्न, जीवन में जश्न, मृत्यु में जश्न– और अंततः आत्मा के उदय पर जश्न ही जश्न!❞
अपने प्रेरक संदेश में मुनिश्री ने श्रोताओं को झकझोरते हुए कहा —
“जन्म तो सबका होता है, पर जीवन उत्सव बने यह प्रयास आवश्यक है। मौज-मस्ती, नाच-गान केवल कुछ पलों की बहलाव है। जीवन का स्थायी जश्न तो अंतर्मन के ठहराव में है।”
उन्होंने चार सूत्रों का मंत्र देते हुए कहा:
बहलाव नहीं, भटकाव नहीं — बदलाव लाओ, ठहराव पाओ।*
इस अवसर पर मुनिश्री ने राजा भोज और “आपदा-संपदा” कथा, सुख-दुख में समता की भावना, और व्यापारियों के दैनिक उतार-चढ़ावों के उदाहरण देकर जीवन में स्थिरता और समत्व की महत्ता को रेखांकित किया।सुख-दुख में समता – यही है जीवन का स्थायी जश्न है।

 

मुनिश्री ने कहा,जिन्हें तत्वज्ञान का बोध होता है, वे हानि-लाभ, मान-अपमान, संयोग-वियोग — किसी में भी विचलित नहीं होते। वे जानते हैं, यह सब कर्मजन्य संयोग हैं। जो धर्म को ‘जीते’ हैं, उनके जीवन का हर क्षण जश्न बन जाता है।”


एक प्रेरक कथा सुनाते हुए मुनिश्री ने उस मंत्री का उदाहरण दिया जिसे सूली की सज़ा मिली और उसी दिन वह जश्न मना रहा था। जब कारण पूछा गया, तो उसने कहा — “फांसी का क्षण बाद में आएगा, अभी तो जीने का क्षण है — और मैं नाचते हुए जीना चाहता हूँ।” इस अद्भुत दृष्टिकोण ने राजा को भी बदल दिया।

 

महापौर मालती राय ने किए गुरुकुलम में दर्शन और गुरुचरण वंदना
भोपाल की प्रथम नागरिक, महापौर श्रीमती मालती राय ने इस पावन अवसर पर मंच साझा किया। उन्होंने अपने भाषण में कहा:
“मैं नेता नहीं, सेवक हूँ — और यह मेरा सौभाग्य है कि मैं गुरुचरणों में बार-बार आने का अवसर पाती हूँ। गुरुदेव की अमृतवाणी से पूरे भोपाल का वातावरण पावन हो रहा है। यदि चातुर्मास भोपाल में हो गया, तो मेरा जीवन कृतार्थ हो जाएगा।”
उनके वक्तव्य में गहरी श्रद्धा, आत्मबोध और समाज सेवा की प्रेरणा स्पष्ट झलक रही थी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *