चतुर्विद संघ के सानिध्य में मां जिनवाणी की पालकी यात्रा निकाल कर बड़ी भक्ति भाव से मनाया गया श्रुत पंचमी महोत्सव।
सनावद:- दिगंबर जैन समाज में ज्येष्ठ शुक्ल की पंचमी तिथि को ‘श्रुत पंचमी’ मनाई जाती है। इस दिन भगवान महावीर के दर्शन को पहली बार लिखित ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया गया था। उक्त उदगार आचार्य विनम्र सागर जी महाराज ने संत भवन में कही।
सन्मति काका ने बताया नगर में विराजमान आचार्य श्री विनम्र सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में श्रुत पंचमी का पर्व मनाया गया। इस अवसर पर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर से श्रुत पंचमी महोत्सव के अवसर पर माँ जिनवाणी को पालकी में विराजमान कर के प्रमुख मार्गों से होकर पुन बड़े मंदिर में पहुंच कर पालकी यात्रा निकली गई तत्पश्चात आचार्य शांति सागर वर्धमान देशना संत भवन में मां जिनवाणी का सामूहिक पूजन किया गया। साथ आचार्य श्री की सामूहिक पूजन की गई ।
आज के इस पावन अवसर पर आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के चित्र के समकक्ष दीप प्रज्वलन एवं आचार्य श्री विनम्र सागर जी महाराज के पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य श्रीमती संगीता महेंद्र कुमार पाटोदी परिवार को प्राप्त हुआ। साथ ही खुशकवर बाई सुरेश जी जैन अमर ज्योति परिवार एवं श्रीमती सरिता राजेंद्र कुमार जैन इंदौर परिवार को भी शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस अवसर पर आचार्य विनम्र सागर जी महाराज ने अपनी वाणी का रस पान करवाते हुवे कहा की शास्त्र पड़ने वाले साधु से मिलिए उनके सामने सब बड़ी से बड़ी डिग्री वाले सब फेल हे क्योंकि बड़ी से बड़ी डिग्री वाले के सामने कोई नहीं झुकता है लेकिन शास्त्रों का अध्ययन करने वाले गुरु के समाने पूरी दुनिया झुकती है। आचार्य श्री ने कहा की आज श्रुत पंचमी क्यों मनाईं जाती है क्योंकि आज के दिन शास्त्र का निमार्ण हुआ था आज जिनवाणी का जन्मदिन है आज भगवान महावीर केवल उपदेश देते थे और उनके प्रमुख शिष्य (गणधर) उसे सभी को समझाते थे, क्योंकि तब महावीर की वाणी को लिखने की परंपरा नहीं थी। उसे सुनकर ही स्मरण किया जाता था इसीलिए उसका नाम श्रुत था। जैन समाज में इस दिन का विशेष महत्व है। इसी दिन पहली बार जैन धर्म ग्रंथ लिखा गया था।


भगवान महावीर ने जो ज्ञान दिया, उसे श्रुत परंपरा के अंतर्गत अनेक आचार्यों ने जीवित रखा। गुजरात के गिरनार पर्वत की चन्द्र गुफा में धरसेनाचार्य ने पुष्पदंत एवं भूतबलि मुनियों को सैद्धांतिक देशना दी जिसे सुनने के बाद मुनियों ने एक ग्रंथ रचकर ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को प्रस्तुत किया।
उस ग्रंथ को ‘षटखंडागम’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन से श्रुत परंपरा को लिपिबद्ध परंपरा के रूप में प्रारंभ किया गया था इसीलिए यह दिवस श्रुत पंचमी के नाम से जाना जाता है।
ने ।इस अवसर पर सभी समाजजनों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। रजतमय का पंचामृत अभिषेक व पूजन किया गया*
सनावद नगर से 3 किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्र पोदनपुरम में परम पूज्य विदुषी आर्यिका प्रशांत मति माताजी द्वारा संकलित एवं पूज्य आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज द्वारा प्रतिष्ठित विश्व की अद्भुत अनोखी *रजतमय मां जिनवाणी का पंचामृत अभिषेक एवं पूजन किया गया । इस अवसर पर अनेक समाज जन उपस्थित थे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


