प्रथमाचार्य चारितचक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम गरिमामय सानंद संपन्न लेखक राजेश पंचोलिया इंदौर 

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प्रथमाचार्य चारितचक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम गरिमामय सानंद संपन्न लेखक राजेश पंचोलिया इंदौर

प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण मूलबाल ब्रह्मचारी पट्टपरंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज अतिशय क्षेत्र टोंकनगर में 57वां वर्षायोग कर रहे हैं। प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम अनेक भव्य कार्यक्रमों के साथ सानंद संपन्न हुआ। सन 1872 में जन्मे श्री सातगोंडा ने श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी से सन 1915 में क्षुल्लक एवं सन 1920 में मुनि दीक्षा ली आपका नाम मुनि श्री शांति सागर जी किया गया। संयमी जीवन में,सर्प , सिंह,चींटी,मकोड़े ,मानवजन्य के अनेक उपसर्गों को नाम के अनुरूप समता भाव धारण कर सहन किया। सन 1924आश्विन शुक्ल ग्यारस को आपको आचार्य पद दिया गया ।उस दिन 4 दीक्षा दी। जिनवाणी जिनालयों और धर्म संस्कृति की रक्षा की जीवन में 9938 उपवास किए 88 भव्य आत्माओं की दीक्षा दी ।उन्हीं की परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्व वारिधी,राजस्थान शासन के राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में दिनांक 3 ओर 4 अक्टूबर 2025 आश्विन शुक्ल 11 एवं 12 से विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों से साथ राष्ट्रीय स्तर पर प्रारंभ हुआ। श्रीजी के पंचामृत अभिषेक मानवचलित श्रीजी की रथयात्रा , ध्वजारोहण भूमिशुद्धि, आचार्य श्री के प्रवचन ,प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर विधान शाम को श्रीजी की आरती ,भजन संध्या का आयोजन हुआ। आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया कि हम सभी का सौभाग्यशाली हैं कि, 20 वीं सदी के सर्वप्रथम दिगम्बर प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी का आचार्य पद का शताब्दी तथा मुनि श्री वीरसागर जी ओर मुनि श्री नेमिसागर जी का मुनि दीक्षा शताब्दी महोत्सव पारसोला से प्रारंभ हुआ है और महोत्सव निरंतरआगे भी चलेगा क्योंकि गुरु का गुणानुवाद समय का मोहताज नहीं है हर दिन हर समय किया जाता है। आपने आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के संयम उपकरण पीछी कमंडल शास्त्र और सिंहासन का अवलोकन किया।आश्विन शुक्ल एकादशी सन 1924 को 4 दीक्षा देने कारण श्री शांति सागर जी को आचार्य पद इसी दिन दिया गया। संलेखना के समय प्रथम मुनि शिष्य श्री वीरसागर जी को उन्होंने समाधि के पूर्व आचार्य पद देकर यही आदेश दिया की परंपरा का निर्दोष पालन करना और अपने समाधि के पूर्व अपने योग्य शिष्य को आचार्य पद देना ।आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा तब से निरंतर निर्दोष रूप से गुरुपरंपरा अनुसार चल रही है। आचार्य पद से धर्म प्रभावना होती है। आचार्य श्री शांतिसागर जी ने चरित्र के सभी छह अंगों का पालन कर जीवन को प्रयोगशाला बनाया। मृत्यु श्रावक की होती है और संलेखना श्रमण साधु की होती है। यह मंगल देशना प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के आचार्य पदप्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव के दो दिवसीय कार्यक्रम में पंचम पट्टाधीशआचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की।गुरुभक्त राजेश पंचोलिया के अनुसारआओ शांति मार्ग पर चले के दिव्य संदेश के आव्हान पर आचार्य श्री वर्धमान सागरजी संघ सानिध्य में श्रीजी की विशाल यात्रा महावीर जिनालय अहिंसा सर्किल से प्रारंभ हुई जिसमें भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों के वेशभूषा परिधानों का विशेष आकर्षण रहा ।बुलेट गाड़ियों ,घोड़े और ऊँट जिनध्वजा युवा लहराते हुए शोभायमान दृष्टिगत हुए ढोल-नगाड़ों, बैंड की मधुर ध्वनियाँ से आच्छादित लहरियों पर युवक युवतियां थिरक कर भक्ति प्रदर्शित कर रहे थे ।पाँच गज (हाथी) पर चयनित श्रीमती कल्पना सुशील कार्वा उदयपुर मुंबई सौंधर्म इंद्र, चक्रवर्ती श्रीमती अलका सुनील जवेरी संघपति परिवार मुंबई,कुबेर , यज्ञ नायक पूर्वा समर कण्ठाली इंदौर तथा कुबेर इंद्र श्रीमती पुष्पा मोहनलाल छामुनिया तथा श्रुतदेवी जिनवाणी माता को लेकर कन्हैयालाल बारवास परिवार हाथियों पर सवार होकर धर्म प्रभावना कर रहे । अनेक बग्घियों पर इंद्र तथा विशिष्ट गणमान्य अतिथि गृहस्थ अवस्था भोज के परिजन, बारामती के श्रीमान चंदू काका परिवार,श्री अरविंद दोषी परिवार विराजित हुए ।शोभा यात्रा में श्री जी आचार्य संघ की आरती पुष्प वृष्टि से स्वागत नगर के सभी राजनीतिक,सामाजिक,धार्मिक संगठनों ने सामाजिक सदभावना का परिचय दिया लगभग 3 किलोमीटर की शोभा यात्रा 4 घंटे में प्रमुख मार्गो से होते हुए आर एन फार्म हाउस पहुंची।नगर में सैकड़ो बैनर लगाए गए प्रशासन द्वारा भी जुलूस की समुचित व्यवस्था की तथा 100 से अधिक नगरों के समाज जान यहां उपस्थित हुए ।कर्नाटक,महाराष्ट्र,तमिलनाडु ,मध्यप्रदेश, राजस्थानदिल्ली ,गुजरात ,छत्तीसगढ़ ,बिहार, असम पश्चिम बंगाल आदि अनेक राज्यों से गुरु भक्त कार्यक्रम में सम्मिलित हुए ।लाखों भक्तों ने जिनवाणी ओर वात्सल्य वारिधी यू ट्यूब से लाइव प्रसारण देखा। कार्यक्रम में आचार्य शांति सागर जी के गृहस्थ अवस्था कर्नाटक के तीसरी पीढ़ी के परिजन विशेष रूप से उपस्थित हुए ।जुलूस में श्रावक श्राविकाएं बगैर जूते चप्पल के चल रहे थे ।सभी मंडल डीजे , बैंड पार्टी की सुमधुर भजनों पर अनेक भक्त भक्ति नृत्य से प्रस्तुत कर रहे थे पंजाब बैंड की प्रस्तुति आकर्षण का केंद्र बन गई। मंगल कार्यक्रम के पूर्व दिवस वर्षा कर इंद्र देवता ने नगर एवं भूमि की शुद्धता की ।घटयात्रा कलश के पवित्र जल से भूमिशुद्धि की। ध्वज वंदन मंगल कलश स्थापना आदि समस्त मांगलिक क्रियाएं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सानिध्य में प्रतिष्ठाचार्य पंडित हंसमुख जी शास्त्री धरियावद के निर्देशन में हुई। ध्वजारोहण श्री अजीत मिंडा मुंबई ,मंडप उद्घाटन श्री सुनील अग्रवाल जयपुर, दीप प्रवज्जलन अनिल सेठी बैंगलोर ,सुरेश सबलावत जयपुर ,राकेश सेठी कोलकाता धर्मचंद जैन टोंक ने किया ।कलश स्थापना 6 प्रतिमा धारी श्रीमती सुशीला अशोक जी पाटनी किशनगढ़आर के मार्बलग्रुप नेकिया। चरण प्रक्षालन का सौभाग्य अजीत मिंडा,श्री राजकुमार सेठी जयपुर ,शास्त्र भेंट अंकेश जोबनेर ,निर्मल ,शांति, सुबोध सुमति छाबड़ा रायपुर दुर्ग ने तथा आचार्य शांति सागर जी के सिंहासन ,संयम उपकरण पीछी , कमंडल शास्त्र का अनावरण राजेश गुणमाला जवेरी मुंबई परिवार ने किया। प्रवचन के बाद आचार्य श्री शांति सागर जी की डॉक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई गई ।आचार्य ससंघ की आहार चर्या ततपश्चात दोपहर को इंद्र प्रतिष्ठा सकलीकरण क्रिया हुई। जिसमें 125 प्रमुख और प्रति इंद्रो द्वारा आचार्य श्री शांति सागर मंडल विधान की पूजन की गई । इस विधान के लिए यज्ञनायक स्पर्श समर कँठाली इंदौर के द्वारा पूजन के सभी द्रव्यों के 100 थाल स्थापना, जल ,कलश, चंदन कलश अक्षतथाल, प्रकार के देश विदेश के पुष्प ,प्रकार के नैवेद्य में मिठाई नमकीन दीप थाल धूप प्रकार के विभिन्न फल सूखे मेवे अध्र्य सभी द्रव्य सभी इंद्र परिवार द्वारा आचार्य श्री शांति सागर जी एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की पूजन कर द्रव्यअर्पित किए मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं आर्यिका श्री महायश मति जी ने विधान की पूजन कराई ।पूजन के दौरान चढ़ाए जाने वाले द्रव्यों अध्र्य में आचार्य श्री के गुणों बाबद भी बताया दोपहर को मुनि श्री दर्शित सागर जी के केशलोचन हुए । दोपहर को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की नूतन प्रतिमा की विधि विधान मंत्रोच्चार से प्राणप्रतिष्ठा की गई। कार्यक्रम का सुंदर संचालन बसंत वेद ने किया किशनगढ़u समाज ने आचार्य संघ को किशनगढ़ में आगमन शताब्दी महोत्सव एवं वर्ष 2026 का चातुर्मास करने हेतु श्रीफल अर्पित किया ।रात्रि को श्री जी ओर आचार्य श्री की 2500 दीपक आरती की गई आमंत्रित कलाकारों ने मन मोहक भजनों की प्रस्तुति दी।दूसरे दिन4 अक्टूबर को उपदेश में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि आचार्य पद शताब्दी महोत्सव मनाना बहुत ही पुण्य का कार्य है चार अक्टूबर को अनेक कार्यक्रम हो रहे हैं। दीक्षित मुनि अपने योग्यता गुणों के आधार पर आचार्य बनते हैं। आज आचार्य श्री शांति सागर जी की विशेषता ,उनके गुणों को वाणी से प्रकट करना कठिन है चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ में उनकी अनेक विशेषता बतलाई है उन्होंने बाहर शरीर से अंतर्मुखी होकर आत्मा के ज्ञान को प्रकट किया और आत्मा में देखने चिंतन करने की प्रवृत्ति को जागृत रखा। देव शास्त्र गुरु हमें मार्ग दिखलाते हैं जिस मार्ग पर वह चले उसको उन्होंने स्वयं निर्मित किया। बने बनाए मार्ग पर चलने से ज्यादा कठिन नया मार्ग बनाकर उस पर चलना महत्वपूर्ण है।गुरु भक्त राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि जीवन में धर्म को धारण कर दीक्षा से जीवन का उत्थान किया जाता है दीक्षा के साथ अहिंसा महाव्रत धारण किया जाता है यह महाव्रत मन, वचन, काय शरीर से पालन किया जाता है ।वाणी में कटुता होना भी हिंसा का सूचक है। 20वीं सदी के आचार्य श्री की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी वर्तमान में भी देखने को मिल रही है ।साधु जीवन में मन ,वचन , काय से पवित्र होते हैं। साधु शूरवीर होते हैं वह अपनी आत्मा की वीरता से कर्म रूपी शत्रु से लड़ते हैं ।आचार्य श्री शांति सागर जी के जीवन में सरलता, सत्य व्यवहार, धर्म के प्रति अनुराग ,और सब परिस्थितियों में समता भाव त्याग , तप आदि गुण थे। आचार्य श्री ने बताया कि हमें ऐसा लगता है कि हम पूर्व जन्म में भी जैन मुनि रहे हैं इसी कारण उसे आगम चर्या का हम वर्तमान जीवन में पालन कर रहे हैं। जैन साधु के लिए मुलाचार ग्रंथ तब प्रकाशित नहीं था ,आचार्य श्री की प्रेरणा से ही मुलाचार ग्रंथ का अब प्रकाशन हुआ है। आचार्य श्री ने सम्यक दर्शन ,सम्यक ज्ञान सम्यक चारित्र जिनागम को जीवन में धारण किया। समाधि के समय भी धर्म से वह परिपूर्ण रहे। और सिद्ध क्षेत्र कुंथल गिरी में 36 दिन की सल्लेखना धारण की। साधु मृत्यु पर विजय प्राप्त करते हैं। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने संघपति जवेरी परिवार मुंबई ,गृहस्थ अवस्था के परिजनों ,चंदू काका बारामती परिवार, डॉक्टर कल्याण अग्रवाल ,अरविंद दोषी सहित पंडित हंसमुख शास्त्री, भागचंद जी एवं टोंक नगर की संपूर्ण समाज के लिए मंगल आशीर्वाद दिया। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व अनेक विद्वानों ने , पंडित श्री हंसमुख जी धरियावद, ने भावांजलि प्रस्तुत की।आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व आर्यिका श्री महायश मति जी ने प्रथमाचार्य श्री ओर 9 के अंक का संयोग बताया जन्म दिनांक 27 ,जन्म वर्ष 1872, कमल की 1008 पंखुड़ी ,108 कमल , 18 वर्ष की उम्र, 36 मूलगुण, 36 दिन की सल्लेखना, 18 करोड़ जाप, समाधि दिनांक 18,समाधि माह सितंबर,,108 गुण आदि से भावांजलि प्रस्तुत की।मुनि श्री हितेंद्र सागर जी महाराज ने गुणानुवादमें बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज बाल ब्रह्मचारी थे उनकी परंपरा में आचार्य वीर सागर जी, आचार्य श्री शिव सागर जी, आचार्य श्री धर्म सागर जी, आचार्य श्री अजीत सागर जी और वर्तमान पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सभी बाल ब्रह्मचारी आचार्य हैं। अनेक उपसर्ग सहन किएबाहर से आमंत्रित भक्तों ने चित्र अनावरण कर दीप प्रवज्जलन कर चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेट की। टोंक नगर में भूगर्भ से प्रतिमाएं निकलने कारण आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने इसे अतिशय क्षेत्र घोषित किया हैं। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर आचार्य पद शताब्दी प्रतिष्ठापना महोत्सव में पूर्व में पत्रकार संगोष्ठी, विद्वत संगोष्ठी, चार्टर्ड एवं एडवोकेट सम्मेलन, शिक्षक सम्मेलन, नारी , युवा सम्मेलन हो चुके है ।श्री भागचंद जी श्री धर्म चंद जी, श्री कमल सराफ ,श्रीमती बीना छामुनिया अनुसार टोंक समाज द्वारा अनेक प्रकल्पों राष्ट्र सेवा,श्रुत जिनवाणी सेवा, श्रमण साधु सेवा माता पिता की सहमति से जैन समाज में शादी करना आदि प्रकल्पों के लिए सांकेतिक 100 सदस्यों को देव शास्त्र एवम आचार्य श्री वर्धमान सागर जी समक्ष संकल्पित कराया।इस अवसर पर गृहस्थ अवस्था की जन्म नगरी भोज से तीसरी पीढी की श्रीमती पद्म श्री पाटिल चौथी के श्री किरण ,श्रीमती सुरेखा, कुमारी प्रणिता सहित उपस्थित हुए। बारामती के प्रसिद्ध संघपति श्री चंदू काका के परिजन , श्री अरविंद दोषी मुंबई के परिजन, संघ पति प्रतापगढ़ मुंबई के श्री सुनील , श्रीमती अलका जवेरी ने भी सहभागिता की।आचार्य श्री शांति सागर फाउंडेशन के श्री अनिल सेठी बंगलौर, श्री संजय पापड़ीवाल किशनगढ़, श्री राकेश सेठी कोलकाता, श्री सुरेश सबलावत जयपुर, श्री सुनील अग्रवाल जयपुर श्री राजकुमार सेठी जयपुर, श्री अजीत मिंडा मुंबई, श्री सुनील जवेरी मुंबई, डॉ कल्याण गंगवाल,श्री भरत जीरभार , श्री समर कँठाली इंदौर, श्री जय, श्री शरद कार्वा उदयपुर, श्री राजेश जवेरी मुम्बई सहित अनेक भक्त उपस्थित हुए सभी के तन मन धन त्याग हेतु तिलक,माला, शाल श्रीफल से स्वागत कर स्मृति चिन्ह भेंट किया।

राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त आलेख संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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