निर्वाह की परंपरा को जो अपने चारित्र के निर्माण में लगा देता है वही अपने जीवन में निर्वाण पद को प्राप्त करता है”समता सागर महाराज

धर्म

निर्वाह की परंपरा को जो अपने चारित्र के निर्माण में लगा देता है वही अपने जीवन में निर्वाण पद को प्राप्त करता है”समता सागर महाराज
सम्मेद शिखर
निर्वाह करना तो सभी जानते है,पशु पक्षी भी अपना निर्वाह कर लेते है लेकिन निर्वाह की परंपरा को जो अपने चारित्र के निर्माण में लगा देता है वही अपने जीवन में निर्वाण पद को प्राप्त करता है” उपरोक्त उदगार निर्यापक श्रमण मुनि समतासागर महाराज ने प्रातः कालीन धर्म सभा में व्यक्त किये।

 

मुनि श्री ने कहा कि “तत्वज्ञान” की जो परंपरा युग के आदि में भगवान आदिनाथ से प्रारंभ हुई वह परंपरा भगवान महावीर पर्यन्त तक जारी रही और उसके पश्चात क्रमशः सभी पूर्वाचार्यों ने उस क्रम को जारी रखा उन्होंने भगवान आदिनाथ से लेकर सोलहवें तीर्थंकर भगवान पंद्रह तीर्थंकरों की चर्चा करते हुये सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ स्वामी से लेकर अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर पर्यन्त तक की चर्चा करते हुये कहा कि इन तीर्थंकरों के काल में भले ही उतारचढ़ाव बहूत आए लेकिन धर्म का कभी नाश नहीं हुआ वह अखंड रुप से चलता रहा और जिन शासन की प्रभावना करता रहा”

मुनि श्री ने कहा कि जैन परंपरा में तत्व का जो स्वरुप आया है, जो करुणा की भावना तथा वीतरागता एवं रत्नत्रय का मार्ग आया है वह एक दो बार नहीं बल्कि चौबीस तीर्थंकरों के शासनकाल से छनकर के इतना प्योर इतना महान तथा श्रैष्ठतम धर्म हम लोगों के पास आया है,और वही परंपरा आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज तथा आचार्य विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से निर्विवाद आगे चल रही है,तथा निरंतर आगे बढ़ रही है।


मुनि श्री ने कहा कि इस पंचम काल में 28 मूलगुण धारी मुनिराजों का जो मेला लगा हुआ है,वह किसी चमत्कार से कम नहीं है, उन्होंने कहा कि भगवान शांतीनाथ स्वामी के जन्म वैराग्य तथा निर्वाण की एक ही तिथी रही उन्होंने सम्मेदशिखर के पहाड़ की जब हम लोग वंदना कर रहे थे तो यंहा के डोली वाले कार्यकर्ताओं से कह रहे थे कि मई जून के महीने में जहा पर इतनी तीव्र गरमी पड़ती थी लेकिन इस बार जब से मुनिसंघ का आगमन हुआ है तब से लेकर अब तक यहा पर कुल्लू मनाली जैसा दृश्य परीलिक्षित हो रहा है, हालांकि यह प्रकृति की विषमता ही मानी जाती है लेकिन हमारे परिणाम तो यह कह रहे है इधर हम लोगों ने गर्मी में विहार किया उधर आचार्य गुरुदेव ने हम सभी लोगों के ऊपर आशीर्वाद की छाया प्रदान कर दी कल हम सभी मुनि संघ औरआर्यिकासंघ ने भगवान शांतिनाथ स्वामी का निर्वाण दिवस ऊपर पहाड़ पर मंत्र जाप का अनुष्ठान कर मनाया तथा विश्वशांति की कामना की।

 

 

 

मुनि श्री ने कहा बाताबरण में शीतलता तथा ओस के कण हम लोगों के शरीर से चिपक रहे थे और सभी की वंदना शांति के साथ संपन्न हुई।भारतवर्षीय दि. जैन तीर्थ कमेटी तथा गुणायतन परिवार के साथ भगवान शांतिनाथ स्वामी की टोंक पर निर्वाण कांड के साथ ठीक आठ बजे मुनिसंघ एवं आर्यिका संघ ने गुरुदेव को स्मरण करते हुये भक्तों ने एक साथ निर्वाण लाड़ू को चढ़ाया।

 

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं मुख्य जनसंपर्क अधिकारी वीरेन्द्र जैन ने बताया प्रातःकाल शांतीधारा आर्यिकारत्न दृढ़मति माताजी के मुखारविंद से संपन्न हुई। तथा दोपहर में आचार्य ज्ञानसागर महाराज का समाधि दिवस आचार्य विद्यासागर सभाग्रह में बाल ब्र. अनूप भैया के निर्दैशन में आचार्य छत्तीसी विधान के साथ प्रारंभ हुआ इस अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर, मुनि श्री पवित्र सागर,मुनि श्री पूज्यसागर, मुनि श्री अतुल सागर महाराज आर्यिकारत्न गुरुमति माताजी, ऐलक श्री निश्चयसागर,ऐलक श्री निजानंद सागर क्षु. संयम सागर महाराज सहित समस्त चतुरविध संघ की उपस्थिति रही। संघस्थ ब्रहम्चारीयो ने दादागुरु आचार्य ज्ञानसागर महाराज के चित्र पर दीप प्रज्वलित किया एवं मुनिसंघ तथा आर्यिका संघ ने भावांजलि प्रस्तुत की, इस अवसर पर आर्यिका दृढ़मति जी ने बताया ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महामुनिराज के द्वारा सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर में 29 आर्यिका मां की दीक्षा संपन्न हुई थी जिसमें से सात माताजी यहा उपस्थित है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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