धर्म के नाम पर हिंसक क्रिया कर कर्म बंध नहीं करना चाहिए आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज

धर्म

धर्म के नाम पर हिंसक क्रिया कर कर्म बंध नहीं करना चाहिए आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज
उज्जैन
अज्ञानता ही सर्व अनर्थों की जड़ है। धर्म भी जानकार करना चाहिए धर्म के नाम पर हिंसक क्रिया कर कर्मबंध नहीं करना चाहिए। सर्वप्रथम सच्चे धर्म के मर्म को समझना चाहिए। हिंसा,असत्य, चोरी, परिग्रह, क्रोध, लोभ, अन्याय, अनीति आतंक में किंचित भी धर्म नहीं हो सकता है। दुख का कारण अधर्म ही है। धर्मात्मा बनो पर धर्मांध मत बनो। धर्म के नाम पर अनर्थ मत करो, पहले धर्म को जानो फिर मानो पंथ परंपरा संप्रदायों में धर्म नहीं।

 

 

यह उद्गार आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहे आचार्य श्री ने धर्मांधों को समझाते हुए कहा कि जो स्व पर, जगत के संपूर्ण प्राणियों को सुखकारी हो, कल्याणकारी हो, आनंदपूर्ण हो वही सच्चा धर्म है। जो सुख दे सुख की प्राप्ति का कारण बने, वही सच्चा धर्म हो सकता है। अहिंसा, सत्य, अचोर्य, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह धर्म है। क्षमा भाव, विनम्रता, विवेक, सत्य प्राणी मात्र का कल्याण हो, अज्ञानता घटे, विशुद्धि बड़े यही धर्म का मार्ग है, जो उत्तम सुख प्रदान करें, यही धर्म है। आत्म कल्याण की दृष्टि ही धर्म है।

भोजन,भाषा, भेष व देहरी से होती है पहचान
आचार्य श्री ने कहा कि घर की देहरी देखकर घर में रहने वाले व्यक्ति की पहचान हो जाती है। भोजन से व्यक्ति के कुल का बोध होता है। भेष एवम भाषा से व्यक्ति के उच्च एवं नीच वंश की पहचान हो जाती है। जिसका शुद्ध सात्विक शाकाहारी भोजन हो, सादा जीवन उच्च विचार हो, विनय पूर्ण भाषा हो तो समझ लेना यह उच्च कुलीन सज्जन पुरुष है।

अल्प अशुद्धि भी सिद्धी में बाधक है
आचार्य श्री ने कहा कि कषाय की एक कनिष्का भी साधक को गिरा देती है। वाहन चालक चुका तो दुर्घटना घट जाएगी और साधक चुका तो अधोपतन हो जाएगा। विशुद्ध भावों का हास ही कष्टकारी है। विशुद्ध की रक्षा करो अशुद्ध से बचो अल्प अशुद्धि भी सिद्धी में बाधक है। विशुद्ध परिणामों से ही शांति संभव है।

संत सैनिक व सम्राट का गहरा संबंध
आचार्य श्री ने आगे कहा कि राजा और सैनिक देश की शत्रुओं से रक्षा करें। साधु संत युवाओं को नैतिक पतन से बचाकर देश व धर्म की रक्षा में संलग्न करें। उन्होंने कहा कि युवा शक्ति ही देश व धर्म उत्थान में सहायक है। धर्म के बिना शासन नहीं चल सकता, और श्रेष्ठ शासन व सजग सैनिकों के बिना आदेश रक्षा संभव नहीं। संत सैनिक एवं सम्राट का गहरा संबंध है। संतों का आशीष, सम्राट की बुद्धि और सैनिकों की जागरूकता देश एवं धर्म को समृद्ध करते हैं।

 

व्यवस्था मत बनाओ व्यवस्थित जीवन जियो
संसार में विवेकी ज्ञानियों की संख्या अल्प है। सत्य को जानने वाले न्यून है। सत्य आचरण करने वाले उससे भी कम है। व्यक्ति को दूसरे को ज्ञान देने के पहले स्वयं को व्यवस्थित जीवन जीना चाहिए। व्यवस्था मत बनाओ व्यवस्थित जीवन जियो। यदि देश के सभी नागरिक स्वयं ही व्यवस्थित अनुशासन जीवन जिए तो व्यवस्था स्वयंमेव बन जाएगी। फिर किसी को व्यवस्था बनाना नहीं पड़ेगा। वस्तु व्यवस्था स्वयं में ही व्यवस्थित है। व्यक्ति को अपनी मानसिकता व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। प्रोत्साहन प्रशंसा पुरस्कार से उत्कर्ष समोत्कर्ष के लिए गुणियों की प्रशंसा करें। छोटे-छोटे बच्चों को प्रोत्साहित करें। युवाओं के श्रेष्ठ कार्यों की प्रशंसा करें। योग्यता अनुसार सेवाओं को पुरस्कार भी देना चाहिए। प्रशंसा,प्रोत्साहन, पुरस्कार एवं सत्कार से नवीन चेतना का संचार होता है। उमंग उत्साह वर्धन होता है जिस कार्य की गति बढ़ती है। परिणाम स्वरूप उत्कर्ष प्राप्त होता है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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