शोभित जैन रामगंजमडी की कलम से

आज अनंतनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक पर आचार्य श्री द्वारा रचित निर्वाण भक्ति हिंदी अनुवाद पढ़कर मन अत्यंत भक्ति और श्रद्धा से भर गया।
एक बालक जो कर्नाटक से राजस्थान आया, जिसे हिंदी बोलना भी नही जानता था, उसने आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज से दीक्षा ले कर मात्र 4 वर्ष में ही अनेक भक्ति पाठ लिख डाले।
शब्द और छंद का अनुपम मिश्रण है ये भक्तियां। शब्दों के साथ क्या खूब खेला है आचार्य श्री ने। पढ़कर यूं लगा मानो वे शब्दों के जादूगर हो। हर छंद को पढ़ते पढ़ते आचार्य श्री के प्रति मन श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता था।
आचार्य श्री प्रत्येक भक्ति के अंत में अपनी भावना अवश्य लिखते हैं..!!
“कष्ट दूर हो, कर्म चूर हो, बोधि लाभ हो, सन्मति हो..!!
वीर मरण हो जिनवर मुझको मिले सामने सद्गति ओ।”
आज जब हम आचार्य श्री की दीक्षा का स्वर्णजयंती वर्ष मना रहे हैं, तब आचार्य श्री द्वारा रचित समस्त भक्ति पाठ का वचन प्रत्येक नगर में, प्रत्येक मंदिर में किया जाना चाहिए।

तभी हम आचार्य श्री की इस विरासत को जन जन तक पहुंचा पाएंगे। गुरुवर के चरणों में बारम्बार नमोस्तु..!!
“शोभित जैन रामगंजमडी
