अहिंसा से ही विश्व मैत्री संभव है परस्पर सहयोग समन्वय विनय की भावना से ही एकता हो सकती है विशुद्ध सागर महाराज
उज्जैन
अहिंसा ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। प्राणी मात्र केसुख शांति का द्वार धर्म है। धर्म ही मंगल है,धर्म ही उत्तम है, धर्म ही शरण है, धर्म ही मुक्ति का उपाय है। जो उत्तम सुख को प्रदान करे। वही धर्म श्रेष्ठ है। धर्म में ही आनंद है।
उज्जैन में विराजित दिगंबर जैनाचार्य108 श्री विशुद्धसागरजी गुरुदेव ने कालिदास मांटेसरी स्कूल में सोमवार सुबह 8.30 बजे धर्मसभा को संबोधित करते हुए यह बात कही।आचार्य विशुद्धसागरजी महाराज ने कहा कि अहिंसा से ही विश्व मैत्री संभव है।
परस्पर सहयोग, समर्पण, विनय की भावना से ही एकता हो सकती है।जीवन मेंउत्कर्ष प्राप्त करना है तो एकता के सूत्र में बंधों एकता, अखंडता से ही विश्व का विकास संभव है। समर्पण से ही शांति स्थापित हो सकती है। महाराज ने कहा कि कार्य से कारण का बोध हो जाता है। जो वर्तमान में धनी है, उसने पूर्व भव में साधुओं को दान दिया था। वर्तमान में जो सुन्दर दिखाई दे रहा है, इसने पूर्व पर्याय में भगवान की भक्ति की थी।

जैसा बीज बोओगे, वैसी फसल उत्पन्न होगी। तप करोगे, तो कर्म सिरेंगे। पाप करोगे तो कर्म बंध होगा। किसी का धन हरण करोगे तो निर्धन बनोगे। कुभाव करोगे तो भव -भव में भटकोगे। विकारों से बचो,सुविचार करो। अच्छा सोचो, अच्छा बोलो, अच्छी दृष्टि रखो, अच्छे कार्य करो। श्रेष्ठ विचार ही श्रेष्ठता प्रदान करते हैं। विचारों के अनुसार ही जीवन की धारा होती है।


आचार्य श्री की 15 वर्ष पूर्व उज्जैन प्रवास की स्मृति
आचार्यश्री ने 2010 में फ्रीगंज में वर्षायोग किया था। सुमति धाम में पट्टाचार्य पद प्राप्तिके बाद प्रथम ग्रीष्मकालीन वाचना उज्जैन में हो रही हैं।गुरुवर 36 साधुओं के साथसर्वप्रथम ऋषिनगर जैन मंदिर के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं विश्वशांति महायज्ञ में सान्निध्यके लिए सन् 2010 में उज्जैन आए थे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

