आत्मज्ञानी एक मात्र आत्महित कार्य करते हैं विशुद्ध सागर महाराज
उज्जैन
दुनिया में कौन सी वस्तु सुंदर है और कौन सी वस्तु असुंदर है। न कोई वस्तु सुंदर है, जिस वस्तु या व्यक्ति सेहमारी राग की पुष्टि होती है, वह हमें प्रिय लगती है और जिससे हमारेराग की पूर्ति नहीं होती है, वह हमेंअप्रिय लगती है। गर्मी के समय सूर्यका ताप अच्छा नहीं लगता, वहीं सर्दी में सूर्य का ताप अच्छा लगता है।
जब किसी से काम होता है तो वह प्रिय लगता है और काम निकलजाने पर उपेक्षा करते हैं। विशुद्धसागरजी गुरुदेव ने धर्मसभा में धर्मोपदेश में यह बात कही आचार्यश्री ने ऋषिनगर मेंधर्मसभा में कहा कि पोथियों का ज्ञान,शब्द ज्ञान सरल है, परंतु आत्म ज्ञान अत्यंत कठिन है। शब्द ज्ञान करोड़ों को होता है, परंतु आत्मज्ञानी अल्प हैं।

भावों के साथ किया गया धर्म ही श्रेष्ठ होता है।
भावों से शून्य किया गया धर्म निष्फल है।सच्चा आत्मज्ञानी जगत के संपूर्णप्रपंचों से अत्यंत दूर ही रहता है।आत्मज्ञानी एकमात्र आत्महित काही कार्य करते हैं। आत्मज्ञानी आत्मकल्याण का ही कार्य करते हैं।

धर्म ही मंगल है, धर्म ही उत्तम है
जहां जिसकी प्रधानता होती है, जो बलिष्ठ होता है, उसकी वहां मुख्यता होती है, शेष की गौणता होती है।जो गौणता व मुख्यता को समझ लेता है, वह उपेक्षाहोने पर भी शांत रहता है। धर्म ही मंगल है, धर्म हीउत्तम है, धर्म ही शरण है। जिसका कोई नहीं होता,उसके लिए धर्म ही शरण होता है। प्राणी मात्र के लिएधर्म शरण होता है। धर्म से बढ़कर अन्य कोई शरणनहीं होता है। धर्म के फल से संपूर्ण सुख प्राप्त होते हैं।
धरा का इस धरा पर सब धरा रह जाएगा, कुछ भी साथ जाने वाला नहीं
आचार्य श्री ने कहापल-पल आयु घट रही है। जैसे-जैसे समय व्यतीत हो रहा है, वैसे-वैसे आयु भीक्षीण हो रही है। बीतने वाली घड़ी को कौन लौटा पाएगा। इस धरा का इस धरा पर सब धरा रह जाएगा। आयु पूर्ण होने पर मृत्यु निश्चित है। आयु क्षीण होने पर सब यहीं छूट
जाता है। जो जो कमा कर रखा है, वह कुछ भी साथ जाने वाला नहीं है। मृत्यु के समीप आने पर तंत्र, मंत्र, औषधि कुछ भी काम नहीं आता है। तंत्र-मंत्र, औषधि उन्हींको ठीक कर सकते हैं, जिनकी आयु शेष है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
