संवेदना हृदय को रसदार बनती है तो असंवेदना हृदय को क्रूर बनाती है प्रमाण सागर महाराज

धर्म

संवेदना हृदय को रसदार बनती है तो असंवेदना हृदय को क्रूर बनाती है प्रमाण सागर महाराज
भोपाल
“संवेदना हृदय को रसदार बनाती है,तो असंवेदना हृदय को क्रूर बनाती है”उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने विद्यासागर प्रबंध संस्थान अवधपुरी में असंवेदनशीलता” पर विचार प्रकट करते हुये व्यक्त किये”

 

मुनि श्री ने कहा वर्तमान समय में व्यक्ती स्वार्थ,मोह,अहंकार तथा भौतिकतावाद से ग्रसित है,तथा असंवेदनशीलता के कारण उसकी आंखों का पानी भी सूख गया है, जैसे सूखी धरती पर अंकुर नहीं फूटता उसी प्रकार शुष्क हृदय में कभी संवेदना जाग्रत नहीं हो सकती, उसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति समाज से दूर होकर मानसिक तनाव से ग्रसित हो, अपने कर्त्तव्य से विमुख हो रहा है, मुनि श्री ने कुछ घटनाओं की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करते हुये कहा कि कोई मां अपने बच्चे को जन्म देकर कैसै झाड़ी में फैक सकती है? कैसै कोई बेटा अपने माता पिता को वृद्धावस्था में बेसहारा छोड़ सकता है? कोई सड़क पर हुये हादसे में घायल व्यक्तियो की वी.डी.ओ तो बना सकता है लेकिन उसे अस्पताल नहीं पहुंचा सकता?

मुनि श्री ने कहा कि जहा “संवेदना आंखों में पानी भरती है,वही असंवेदन व्यक्ति की आंखों का पानी सूख जाता है,” उन्होंने कहा कि अपने कष्टों में तो सभी आंसू बहा लेते है, जो औरों के कष्टों में आंसू बहाता है,वह धर्मध्यान कर पाता है, दुसरों के दुख में दुखी होंना व्यथा की अभिव्यक्ति है,वही अपने कर्तव्य का पालन करना, बुजुर्गों की सेवा करना भी एक साधना है,

मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ती कर्तव्य विमुखता के कारण उदासीन होता रहा है,वह स्वंय के प्रति अपने बच्चों के प्रति परिवार के प्रति,समाज तथा राष्ट्र के प्रति भी संवेदनहीन हो गया है और इसी “संवेदनहीनता” के कारण आंतकवाद और बलात्कार जैसी घटनाएं घट रही है,छोटा भाई समर्थ होते हुये भी उसके पिता समान बड़े भाई तथा मां समान भाभी को दूसरों के सामने हाथ जोड़ना पड़ रहे है, यदि बड़े भाई को बीमारी के कारण दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़े तो इससे बड़ी शर्मिंदगी और क्या बात हो सकती है?

 

योग्य बेटा बहु के होते हुये माता पिता वृद्धाश्रम में अपने दिन बिता रहे ऐसी कही घटनाएं आये दिन समाज में घट रही है। मुनि श्री ने कहा कि ऐसा भी नहीं है कि सभी लोग असंवेदनशील हो गये हो, जिनके अंदर दया करूणा पलती है,जिनकी आंखों में पानी है ऐसे समाजसेवी संस्थायें भी है जो समाज की सेवा करने में सबसे आगे है।

 

उन्होंने भोपाल की ही संस्था श्री विद्याप्रमाण सर्व मंगल भोजन समिति जो कि केंसर हास्पिटल में सैकड़ों लोगों को भोजन उपलब्ध करा रही है का उदाहरण देते हुये कहा कि ऐसी कही समाज सेवी संस्थायें है जो लोगों के दुःख में सहयोगी बनकर उनके आंसुओं को पौछने का कार्य कर रही है, जो लोग अपने आपको हाई प्रोफाइल का और बड़ा व्यक्ति मानते है वह प्रायः समाज से कट जाते है।

 

राष्ट्रीय कवि मैथलीशरण गुप्त ने लिखा है “जो जनता से जितना दूर खड़ा है, वह नभ के बीचों बीच पड़ा है, अर्थात वह न इधर का है न उधर का मुनि श्री ने कहा कि मिट्टी में पानी डालो तो वह मिट्टी भी फूल जाती है,जबकि पत्थर पर कोई असर नहीं होता कुछ लोग पत्थर पर पानी डालने के समान हो गये हें उन पर उपदेशों का कोई फर्क ही नहीं पड़ता।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बौद्धिक आर्थिक विकास ने हमारी भावनात्मक विकास को अवरुद्ध किया है उसे करुणा,सेवा, स्वाध्याय,और सामायिक के माध्यम से दूर किया जा सकता है। अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

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