“परिस्थितियों पर नियंत्रण हमारे हाथ में नहीं मनस्थिति पर नियंत्रण हमारे हाथ में है” -मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज
भोपाल
मन” में जब द्वंद और खींचातानी होती है,तो हमारी नींद उड़ जाती है, हमारा मन अशांत होकर थकान और बेचैनी उत्पन्न करता है उस अशांत वातावरण से शांति चाहते हो “मन को संतुलित करो” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने अवधपुरी में व्यक्त किये।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनिश्री के प्रतिदिन प्रवचन 8:30 बजे से नकारात्मक शब्दों को लेकर चल रहे है, मुनि श्री ने कहा कि जीवन में यदि नकारात्मकता हट जाये तो जीवन सुखी हो जाये नकारात्मक शब्दों की श्रैणी में “अशांति”शब्द की व्याख्या करते हुये कहा कि उपरोक्त संद्रभ में आचार्य गुरुदेव ने एक हायकू लिखा है “मलाई कंहाँ अशांत दूध में सो प्रशांत बनो” उन्होंने कहा कि जैसे दूध में मलाई कभी खोलते दूध में नहीं पड़ेगी उसके लिये उससे प्रशांत अर्थात ठंडा होंना पड़ेगा मुनि श्री ने अशांत व्यक्ति के लक्षण बताते हुये कहा कि नींद का असंतुलन, थकान, बार बार जगना अनिद्रा यह कोई बीमारी नहीं बल्कि मन की अशांति है,इस अशांति से दुराव और टकराव की स्थिति बनती है तथा आपसी संबंधों में तनाव और कटुता खींचातानी और असमंजस आती है, मन की यह अशांति हमारे संपूर्ण जीवन को विषाक्त बनाकर समरसता को समाप्त कर देती है।
मुनि श्री कहा कि अशांति हमारे अंदर की एक दुर्बलता है,जब हम दूसरों से अपनी तुलना शुरु करते है,तो हमारे अंदर की सहजता समाप्त हो जाती है,संत कहते है कि तुम जो हो जैसे हो अच्छे हो इस बात की तुलना किसी से मत करो इससे मन अशांत होगा। साथ ही जब अपेक्षाओं की उपेक्षा होंने लगती है तो मन अशांत हो जाता है, मुनि श्री ने कहा कि अपने अतीत की स्मृति और अपेक्षाओं को कम करो “परिस्थितियों पर नियंत्रण आपके हाथ में नहीं लेकिन मनस्थिति पर नियंत्रण तो आपके ही हाथ में है,आप अपने मन को क्यों अशांत करते हो? अपनी आलोचक प्रवृति पर रोक लगाओ, अपने दोषों को देखो दूसरों में दोष ढूंढना बंद कर दोगे तो आपके अंदर की अशांति दूर हो
जाएगी।

मुनि श्री ने कहा कि जैसी व्यवस्था है उस व्यवस्था को स्वीकार करो यदि अस्वीकृति होगी तो आपका मन अशांत हो जायेगा।मुनि श्री कहा कि शांति चाहिये तो में और मेरा ममकार और अहंकार को हटाइये और अपनी दृष्टि को बदलिये अपने चित्त को आध्यात्मिकता की ओर मोड़िये “शांति का संबंध बाहरी परिस्थिति से नहीं हमारी मानसिक स्थिति से है” “सब मेरे अनुरूप हो यह असंभव है,सबके अनुरुप अपने आपको बनाना संभव है,तो आप असंभव चाहते हो या संभव? मुनि श्री कहा कि बाहर कुछ भी होता रहे हम अपने आप में रहें गुरुदेव ने एक हायकू लिखा“सुनना हो तो नगाडे के साथ में बांसुरी सुनो” बाहर के नगाड़ों का कितना भी शोर हो तुम्हारे अंदरआध्यात्म की बांसुरी बजेगी तो मन शांत रहेगा। मुनि श्री ने कहा कि भावनायोग के माध्यम से भगवान को साक्षी मानकर शांति की प्रार्थना करो तथा अशांति के कारणों को दूर कर प्रत्याख्यान के साथ अपने आत्मस्वरूप का चिंतन करना चाहिये।


मुनि श्री ने कहा कि अशांति मिटती नहीं है,उस अशांति को जागरूकता से विसर्जन कर दोगे तो आपके अंदर की अशांति दूर हो जाएगी। प्रवचन के उपरांत भावनायोग कराते हुये कहा कि यदि हम प्रतिदिन यह भावनायोग करेंगे तो हमारा अशांत मन शांत हो जाएगा।कार्यक्रम का संचालन अभय भैया आदित्य ने किया
अविनाश जैन से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



