मुनि श्री सुधासागर महाराज ने कहा प्रत्येक वस्तु अपने आप में एनर्जी रखती है

धर्म

मुनि श्री सुधासागर महाराज ने कहा प्रत्येक वस्तु अपने आप में एनर्जी रखती है
बहोरीबंद
दिगम्बर जैन चमत्कारोदय तीर्थ में परम पूज्य आध्यात्मिक संत निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108 श्री सुधासागर महाराज निर्यापक मुनि श्री प्रसाद सागर जी महाराज मुनिश्री पदम सागर जी महाराज मुनिश्री शीतल सागर जी महाराज क्षुल्लक श्री वरिष्ठ सागर जी महाराज क्षुल्लक श्री गम्भीर सागर जी महाराज क्षुल्लक श्री विदेह सागर जी महाराज ससंघ एवं प्रतिष्ठाचार्य प्रदीपभइया सुयश के निर्देशन में चल रहे श्री मद् जिनेन्द्र पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव एवं विश्वशांति महायज्ञ का समापन हो गया।

 

इस बेला में मंगल प्रवचन देते हुए मुनि पुंगव श्री सुधासागर महाराज ने कहा कि प्रत्येक वस्तु अपने आप में एक एनर्जी रखती है चाहे चेतन हो या अचेतन। सबका अलग-अलग नेचर होता है, सारे निमित्त एक नेचर वाले नहीं होते। जैसे सभी पत्तियों का नेचर अलग अलग होता है, तुलसी की पत्ती अलग है, नीम का अलग। इसी प्रकार सभी पाषाण एक समान नहीं होते, कोई रत्न रूप होता है उसका नेचर अलग होता है, भारतवर्ष में जितने भी मूर्तियां है सभी का नेचर अलग अलग है। उनके नेचर के अनुसार ही ये तीर्थवन्दना व अनेक मंदिरों की स्थापना की जाती है। ये मूर्तियां मूक रहती हैं लेकिन इनके दर्शन करने से हमारे उस कार्य में एक शगुन का संकेत मिलता है, यही शुभोदय की मूर्ति में है। जिन लोगों को संदेह हो कि मेरा यह कार्य होगा या नहीं, वे एक बार शुभोदय तीर्थ बीनागंज में जाकर उनके सामने खड़े होकर नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ लेना, वो नियम से संकेत देगा कि तुम सफल होगें।

 

मुनिश्री ने कहा कि जिस जाप से श्री मद् जिनेन्द्र पंच कल्याणक महा महोत्सव एवं विश्वशांति महायज्ञ इतना बड़ा कार्यक्रम संपन्न होता है तो फेरने वालों की जिंदगी के कितने कार्य सानंद सम्पन्न होंगे। आराध्य देव से परमार्थ संभलता है और इष्ट देव से संसार संभलता है।

 

आलंबन में मात्र अभिप्राय का अंतर रहता है
उन्होंने कहा कि धर्मध्यान सदा आलंबन रूप होता है और आलंबन में मात्र अभिप्राय का अंतर रहता है।

 

जब व्यक्ति उसी आलंबन से आत्मा के स्वरूप का चिंतवन करता है और भगवान में भावी पर्याय दृष्टिगोचर करता है तो अंतरंग धर्मध्यान होता है और जब मात्र भगवान के गुणों का चिंतवन करता है, गुणों की प्रसंशा करता है, वह बहिरंग धर्मध्यान कहलाता है।

अंतरंग धर्मध्यान कर्मों का क्षय करता है और बहिरंग धर्मध्यान पुण्य की श्रीवृद्धि करता है, जिससे संसार का वैभव मिलता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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