ज्यादा बोलना, ज्यादा गुस्सा करना, ज्यादा उम्मीद करना, जल्दी ज्यादा विश्वास करना यह सब जरूर से ज्यादा कष्ट देते हैं प्रसन्न सागर महाराज
दरीमखाना
आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि
जब तक हम सबकी सब बातों को चुप रहकर बर्दाश्त करते रहते हैं, तब तक दुनिया को अच्छे लगते हैं..
यदि हमने एकाद बार भी सच्ची हकीकत बयां कर दी, तो सबसे बुरे लगने लगते हैं..!
उन्हें वर्तमान की दशा पर बोलते हुए कहा कि मैं देख रहा हूं – आजकल हर चीज ऑनलाइन हो गई है। हर किसी को मोबाइल में एक क्लिक पर लगभग सारी सुविधाएं उपलब्ध हो रही है। और इसी कारण लोगों में बेहिसाब हड़बड़ाहट, उतावलापन या जल्दबाजी दिख रही है। जब उन्हें कोई चीज तुरन्त या उनके हिसाब से नहीं मिलती, तो उनमें एक चिड़चिड़ाहट सी होने लगती है, और यही चिड़चिड़ापन गुस्से में कषाय में तब्दील होने लग जाता है।

उन्होंने कहा इसके अलावा आजकल मैं देख रहा हूं — आपस में होड़, ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिस्पर्धा की भावना दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। वैसे भी लोग जब किसी को अपने से अच्छा कार्य करते देखते हैं, या कोई अच्छा दान सेवा परोपकार के कार्य करते देखते हैं,या गुरूओं के निकट देखते हैं, तो उनमें ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिस्पर्धा और होड़ की भावना पैदा होती है। आगे चलकर वह ईर्ष्या हमारे स्वभाव और व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है और लोग दूसरों के प्रति अच्छे कार्यों को देखकर सहज ही ईर्ष्या, द्वेष के चलते असभ्य व्यवहार भी करने लगते हैं।
उन्होंने जोर देते हुए कहा किध्यान रखना — अपनी वाणी व्यवहार के परिणाम के बारे में जरूर सोच लेना।अगर आप दूसरों से ईर्ष्या कर रहे हैं, द्वेष कर रहे हैं तो आपके पास वही लौट के आएगा। अपनी भाषा में संभव कैजुअल शब्दों से बचें, चिल्ला कर बोलने से अच्छा है आवाज को मंद स्वर में बोलें।

यदि कहीं आपका अपमान हो रहा हो, वाद विवाद की स्थिति या लड़ाई झगड़े की नौबत पैदा हो रही हो तो आप समझदार होने के नाते उस जगह से हट जाएं, क्योंकि — ज्यादा बोलना, ज्यादा गुस्सा करना, ज्यादा उम्मीद करना और जल्दी ज्यादा विश्वास करना,, यह सब जरूरत से ज्यादा कष्ट देते हैं…!!!।
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया 9929737312




