महापुरुषों का जीवन हम सभी के लिये प्रेरणा होता है भगवान महावीर ने साधारण रूप से जन्म लिया और वह हम सभी के लिये प्रेरणास्रोत बन गये प्रमाण सागर महाराज
भोपाल
महापुरुषों का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा होता है भगवान महावीर ने साधारण रूप में जन्म लिया और वह हम सभी के लिए प्रेरणा स्रोत बन गएउपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने जवाहर चौक दि. जैन मंदिर में प्रातःकालीन धर्म सभा में व्यक्त किये।
मुनि श्री ने कहा कि जब कभी भी हम धर्म क्रियाओं की बात करते है तो हमारा ध्यान पूजा पाठ आदि ऊपरी क्रियाओं की ओर चला जाता है,लेकिन वास्तविक धर्म तब है जब हमारी चेतना में आध्यात्मिकता का संचार हो, उन्होंने कहा भगवान महावीर ने जिस धर्म का उपदेश दिया वह व्यवहार और निश्चय दोनों में आलम्बनीय है,भगवान ने कहा “धर्म मंगल और उत्कृष्ट है, तथा अहिंसा संयम और तप स्वरुप है।
मुनि श्री ने कहा कि “हम धर्म की बात करें और हिंसा में लीन रहें तो धर्म का कोई मतलब नहीं”* जब हम मन वचन और शरीर के स्तर पर अहिंसा को स्वीकार करते है तभी हमारे अंदर धर्म प्रकट होता है, उन्होंने कहा कि अहिंसा मय जीवन वही जी सकता है जो अपनी आत्मा की तरह सभी प्राणियों की आत्मा को जोड़कर देखता है,जो स्वं के अस्तित्व के साथ सभी के अस्तित्व का अभिनंदन करता है उसका हृदय संवेदनशील बन जाता है और वही व्यक्ती सच्चे अर्थों में धर्म को धारण करने योग्य होता है।
मुनि श्री ने कहा कि किसी जीव को मारना तो हिंसा है ही मारने का भाव आना भी “हिंसा” है* “दूसरों की हिंसा तो हिंसा है स्व की हिंसा भी हिंसा है”भगवान महावीर कहते है कि “अहिंसा” धर्म का पालन वही व्यक्ति कर सकता है जो स्वयं के प्रति भी जागरूक है मुनि श्री ने कहा कि दियासलाई जलती है वह दूसरों को जला पाये अथवा नहीं जला पाये खुद को तो उसे जलना ही पड़ता है,उसी प्रकार जैसे ही “हमारी आत्मा में दूसरों को मारने का भाव उत्पन्न हुआ कि वह हमारी चेतना को तुरंत विदग्ध कर देती है” यह स्व के प्रति हिंसा है।
मुनि श्री ने कहा कि हम सभी को स्व- स्वजन और समाज की हिंसा से बचना चाहिए, जब कभी आपका मन दूसरों के प्रति हिंसा का हो तो तुरंत अपने भाव और विचारों को अपना प्रहरी बनायें तथा यह प्रतिक्रमण करें हे भगवन मेरा यह विचार यह दुष्कर्म दुष्कृत हो और फिर कभी इसकी पुनरावृत्ति न हो यदि यह अभ्यास हम नियमित करेंगे तो हम निश्चित करके उस पाप को करने से बच सकेंगे संत कहते है कि जब कभी भी किसी के प्रति दुर्भावना उत्पन्न हो तो वह भले ही सामने हो न हो तुरंत ही उससे मन ही मन क्षमा मांग ले।

यही हमारा “प्रतिक्रमण” है,तथा अपने भावों के प्रति हमेशा जागरुक रहो जिससे उसकी पुनरावृत्ति न हो यही हमारा “प्रत्याख्यान” है, जब कभी भी आपके मन में किसी के प्रति आर्तध्यान हो तो तुरंत एक कायोत्सर्ग करो और क्षमा मांगो।
मुनि श्री ने कहा कि यह जन्मजन्मांतर के संस्कार है,वह इतनी जल्दी नहीं जाएगे इसलिये इन संस्कारों के प्रति हमेशा सावधान रहिये जिससे अपने जीवन व्यवहार को ऊंचा उठा सकें। कभी भी किसी के साथ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग मत करो, शब्दों की चोट से ही “महाभारत” हुआ था यह बात आप सभी जानते ही है यदि यह सावधानी और सजगता रखोगे तो आप शाब्दिक ह़िंसा से बच जाओगे दूसरा आरोपात्मक आलोचना परख शब्दों से अपने आपको बचाइये, बिना छानबीन के दूसरों पर आरोप न लगाइये।
मुनि श्री ने कहा कि जीवन व्यवहार में आदेशात्मक शव्दों का प्रयोग कभी नहीं करना चाहियेमुनि श्री ने कहा कि “जैसा तुम अपने प्रति व्यवहार नहीं चाहते वैसा व्यवहार दूसरों के साथ न करो”अपना व्यवहार ऐसा बनाओ कि लोग तुम्हें याद करें,आखरी बात है अपने “मन” को नियंत्रित करें उसे सही दिशा देंगे तो आप विषय विकारों से बच सकोगे, विवेक के अभाव में कभी भी धर्म नहीं पलता अपने जीवन को तपोमय बनायें।
इस अवसर पर मुनि श्री निर्वेगसागर महाराज ने कहा कि हर काम को अपने हाथ से काम करने की आदत डालना चाहिये जीवन को जितना अधिक तपाओगे उतना ही आपका जीवन चमकदार बनेगा “स्वाश्रित जीवन” आपको अभक्ष्य भोजन से बचाता है, मुनि श्री ने कहा कि स्वावलंबन और संयम का पालन करना चाहिये तथा जैन कुल परंपरा का पालन करना चाहिये तथा रात्री भोजन का त्याग करना चाहिये ।इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज सहित समस्त क्षुल्लक उपस्थित थे।उपरोक्त जानकारी संघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312




