शनि अमावस्या एवम भगवान अनंतनाथ, भगवान अरहनाथ के मोक्ष कल्याणक महोत्सव के अवसर पर 29 मार्च 2025 समवशरण तीर्थ असुरिया पर विशेष अभिषेक महोत्सव होगा

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शनि अमावस्या एवम भगवान अनंतनाथ, भगवान अरहनाथ के मोक्ष कल्याणक महोत्सव के अवसर पर 29 मार्च 2025 समवशरण तीर्थ असुरिया पर विशेष अभिषेक महोत्सव होगा
असुरिया
परम पूजनीय तपोभूमि प्रणेता पर्यावरण संरक्षक आचार्य श्री 108 प्रज्ञा सागर महाराज की प्रेरणा से निर्मित समवशरण तीर्थ असुरिया गुजरात में शनि अमावस्या एवम भगवान अनंतनाथ, भगवान अरहनाथ के मोक्ष कल्याणक महोत्सव के अवसर पर 29 मार्च 2025 को विशेष अभिषेक किया जाएगा एवं महा महोत्सव मनाया जाएगा।

 

प्रातः है की बेला में नित्य अभिषेक उसके उपरांत भगवान मुनिसुव्रतनाथ का अभिषेक एवं शांति धारा की जाएगी इसके उपरांत नित्य नियम पूजन पूजन उपरांत निर्वाण लाडू समर्पित किया जाएगा।

यदि हम तीर्थ के विषय में जाने तो यह तीर्थ परम पूज्य आचार्य श्री प्रज्ञा सागर महाराज का एक सपना था जो साकार रूप ले चुका है आचार्य श्री की प्रेरणा से निर्मित यह तीर्थ आस्था का एक केंद्र बिंदु है।

भारत के हृदय स्थल दिल्ली मुंबई रेल मार्ग पर बड़ौदा एवं सूरत के बीच भरूच मुख्य स्टेशन से मात्र 13 किलोमीटर एवं बडौदा स्टेशन से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। असुरिया ग्राम से मात्र 200 मीटर दूर शांत एवं मनमोहक परिसर में यह स्थान है। प्रत्येक शनि अमावस्या एवं हर एक पर्व इस क्षेत्र पर बड़े हर्ष के साथ मनाया जाता है।

जमीन से 12 फुट अंदर से तथा 30 फीट ऊपर विशाल स्तंभ के रूप में समवशरण मंदिर का निर्माण जिसमें प्रथम तल पर चार विशाल खडगासन प्रतिमाए एवं ऊपर की भाग में खुले आकाश के तल में पद्मासन मुद्रा में मूलनायक मुनिसुव्रतनाथ भगवान की प्रतिमा है। विशेष बात यह है कि प्रतिमाओं के ऊपर कल्पवृक्ष कलश के साथ अपनी छटा बिखेर रहा है। चारों दिशाओं में चार मान स्तंभ प्रतिमाएं शोभायमान हैं।

कैसे बनी समवशरण तीर्थ की रूपरेखा
जैन आगम एवं अन्य ग्रंन्थो के अनुसार भरुच पौराणिक नगर रहा है नर्मदा नदी अमरकंटक से बिंदु के रूप में निकलकर कल-कल करती हुई अक्षुण जल प्रवाह से लाभान्वित करती हुई भरुच नगर में ही सागर में
अपना अस्तित्व को विलीन कर देती है। पौराणिक दृष्टि से यह क्षेत्र आज भीभृगुऋषि की याद दिलाता है । बाद में यह भृगुकच्छ एवं भृगुपुर के रुप में अपना अस्तित्व रखते हुए वर्तमान में भरूच नाम से अपनी पहचान बनाए हुए है।

 

भरुच नगर के जैन श्रेष्ठीगण पिछले गत शतकों से मुनिसुव्रतनाथ के समवसरण की पावन भूमि पर तीर्थ क्षेत्र विकसित करने का स्वप्न संजोये हुए थे। समय प्राप्त कर भरुच का भाग्य उदय हुआ। इस क्षेत्र को मूर्त स्वरुप देने का कार्य आचार्य श्री पुष्पदन्तसागर जी महाराज के परम सुयोग्य शिष्य, पर्यावरण संरक्षक तपोभूमि प्रणेता आचार्य श्री 108 प्रज्ञासागर जी महाराज के भरुच आगमन पर निश्चित हुआ । भरुच
चार्तुमास के अन्तर्गत 11 अगस्त 2012 में समवसरण तीर्थ का शिलान्यास आचार्य श्री के सानिध्य में सम्पन्न हुआ।पूज्य श्री से आर्शीवाद प्राप्त कर, ट्रस्ट का गठन कर निर्माण कार्य प्रारम्भ हो गया और इसका परिणाम यह हुआ कि शिलान्यास के साथ ही भूमि ऊर्जावान होने लगी, साथ ही निर्माण कार्य तीव्रगति से प्रारम्भ होकर मा त्र400 दिन मे कार्य परिपूर्ण हो गया। पूज्यश्री महाराज ने पंचकल्याणक की तिथि निश्चित करके शीघ्र ही उन्हीं के सानिध्य में सानंद एवं धर्ममय वातावरण के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भव्यातिभव्य प्रतिष्ठा कराकर महाराज श्री संघ सहित विहार कर गए। अब हम सब का यह परम सौभाग्य है कि “समवसरणतीर्थ” समाज एवं देश के लिए अविस्मरणीय धरोहर के रुप में चर्तुमुखी विकास करता हुआसुसंस्कार, धर्म प्रभावक, उत्साह, आनंदवर्धक, एवं अर्न्तमुखी साधना की ओर अनवरत रूप से प्रगतिशील रहे।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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