सुख दुख की अभिव्यक्ति जीव के परिणाम से तथा शरीर के माध्यम से मिला करती है समता सागर महाराज
सम्मेद शिखर
हमारी चेतना ज्ञान दर्शन स्वभावी है,उसमें कर्म का कोई संयोग या संबंध नहीं,”सुख दुःख की अभिव्यक्ति जीव के परिणाम से तथा शरीर के माध्यम से मिला करती है” जैसे दूध में शक्कर घुल मिल जाती है,तो वह दिखाई नहीं देती है, उसी प्रकार “जीव” के रागद्वेषादि परिणाम इस शरीर के निमित्त से कर्म रुप में परिणमन कर एक रुप हो जाते है वह दिखाई नहीं देते”
उपरोक्त उदगार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने गुणायतन श्री सम्मैदशिखर तीर्थ पर व्यक्त किये। उन्होंने कहा भले ही आप दूध में पानी मिलाओ अथवा मत मिलाओ लेकिन स्वभाव से दूध में जल का अंश है,उस जल को नष्ट करने के लिये दूध को गरम करने के लिये बर्तन जरूरी है तभी वह दूध गरम हो पाएगा उसी प्रकार आत्म तत्व को पाने के लिये शरीर रूपी वर्तन को तपाना आवश्यक है।
मुनि श्री ने कहा कि पूरी दुनिया में जैनी कर्म सिद्धांत को मानते है,कर्म सिद्धांत सबसे बड़ा सिद्धांत है कर्म और भाग्य एक ही बात है कर्म अच्छे भी बनते है,एवं बुरे भी बंधते है”सुख दुःख कीअभिव्यक्ति जीव के परिणाम से शरीर के माध्यम से ही मिला करती है”

मुनिसंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी तथा गुणायतन के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी वीरेन्द्र जैन ने बताया प्रातः7-15 से मुनिश्री के प्रवचन गुणायतन में हो रहे है तत्पश्चात भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा मुनि श्री के मुखारविंद से संपन्न हो रही है।


30 मई गुरुवार को पंद्रहवें तीर्थंकर धर्मनाथ भगवान का मोक्षकल्याणक है मोक्षकल्याणक स्थल पर प्रातः7:45 पर निर्वाण लाड़ु मुनि श्री पवित्र सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में चढ़ाया जाएगा तथा गुणायतन में शांतीधारा के उपरांत 8 बजे चढ़ाया जाएगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

