अर्हम गुरु मुनिश्री 108 प्रणम्य सागर महाराज के दीक्षा दिवस पर भाव भीनी अभिव्यक्ति
इस युग का सोभाग्य है की इस युग मे आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज का जन्म हुआ ऐसे महामना संत आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज ने कलयुग मे सदयुग जेसी शिष्यमण्डली तैयार की जिनके कारण जिनधर्म की ध्वजा जयवंत है।
उन्ही की शिष्य मण्डली के शिष्य अर्हम गुरु मुनिश्री 108 प्रणम्य सागर महाराज का हम 28 वा मुनि दीक्षा दिवस मनाने जा रहे है जो हम सभी के लिए पुण्य और गौरव का क्षण है उनके ज्ञान तप साधना संयम पर वर्णन करते हुए शब्दों की सीमा असीमित हो जाती है ज्ञान संयम तप त्याग की अविरल धारा को महाराज श्री प्रवाहमान कर रहे है ।

विवरण
महाराज श्री को प्राकृत भाषा के साथ चार भाषाओ का ज्ञान है जिसमे हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत और अंग्रेजी प्रमुख है। इतना ही नहीं इन चार भाषाओं में पूज्य मुनि श्री ने 80 से भी अधिक ग्रंथों, टीका ग्रंथों, काव्यों, पद्यानुवादों, स्तोत्र आदि की रचना की। जो सभी के कल्याणकारी है। महाराज श्री ने ज्ञान एवम अर्हम योग के माध्यम से अनेको के जीवन का उद्धार किया है। उनके द्वारा रचित कविताए भजन सभी को प्रभु के समीप ले जाती है,आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज के प्रति भाव प्रकट करते हुए उन्होने एक भजन रचित किया जो सभी को भाव विभोर कर देता है जो स्वयं मोक्ष पद पर चले जा रहे और भव्यो को भी साथ ले जा रहे है।
मुनिश्री ज्ञान ध्यान गुणों के सागर है

आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने जो उन्हे दीक्षा उपरान्त नामकरण वो नाम सार्थक परिलक्षित होता है यदि उनके नाम के अर्थ को समझे तो प्रणम्य का आशय प्रणाम करने योग्य। अपने गुरु महाराज से मिले नाम को जिन्होंने सार्थक कर दिया, ऐसे अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी, प्रज्ञा श्रमण, प्राकृत भाषा मर्मज्ञ, वर्तमान में श्रुत केवली समान, महायोगी, जैन दर्शन के परम ज्ञाता, अर्हं ध्यान योग द्वारा मानवता का उपकार करने वाले, परोपकार करने वाले प्राकृत भाषा को जन-जन तक पहुंचाने वाले परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के बारे में जितना लिखा जाए उतना कम है।



कोई अतिश्योक्ति नहीं है की संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज, आचार्य श्री के खजाने के एक नायाब अनमोल हीरे हैं। इस हीरे की चमक से एक तरफ सम्पूर्ण जिनागम प्रकाशित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर जन समुदाय के जीवन में ज्ञान, ध्यान और योग का प्रकाश फैल रहा है। जिस प्रकार सागर अपने अन्दर अनेक रत्नों को समाये रहता है, उसी तरह परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज अपने दादा गुरु और गुरु महाराज दोनों के रत्न रूपी अनेक गुणों को अपने में समाए हुए हैं। दादा गुरु आचार्य प्रवर ज्ञानसागर जी महाराज के पद चिन्हों पर चलते हुए संस्कृत का अद्भुत, सूक्ष्म, गहन ज्ञान व लेखन और गुरु महाराज आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के पद चिन्हों पर चलते हुए उन्हीं की तरह का चुम्बकीय व्यक्तित्व, सरलता, समता, शांति मूर्ति और दोनों की तरह बहुभाषाविद, दार्शनिक कवि, कुशल काव्य शिल्पी, श्रेष्ठ चर्या पालक, कठोर साधक, चिन्तक, लेखक और जैन आगम के अनेक विषयों के आप ज्ञाता हैं।
मुनि श्री के विषय में यही कहेंगे हीरे को परख लिया आचार्य विद्यासागर, फिर कण कण प्रकाश किया हैं मुनि प्रणम्य सागर ऐसे महामना संत के विषय में लिखते हुए वर्णन करते हुए इनका तो वंदन हो जाता है। लेकिन इनका वंदन वंदन करते करते खुद का वंदन हो जाता है। ऐसे महामना संत ने कलयुग में सदयुग का निर्माण करने हेतु प्रेरणादायक कार्य किया है। यह संतों की प्रेरणा ही है कि, जहां युवा भौतिकता में धूमिल हो रहा था वहीं ऐसे युवा संत ने आकर युवाओं को धर्म से जोड़ने का कार्य किया और आज का युवा संस्कारों को प्रवाहमान करते हुए धर्म संस्कृति के साथ राष्ट्र के नवनिर्माण में कार्य कर रहा है। निश्चित रूप से ऐसे संत हमारे लिए अनुकरणीय हैं और वंदनीय हैं।
उनके चरणों में वंदन बारंबार
आपकी उम्र हो साल हजार
हे गुरु आपकी महिमा अपरंपार
हे गुरुवर वंदन बारंबार
अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमंडी 9929747312
