*अन्तर्मना उवाच**अप्राप्त वस्तु का ही आकर्षण है..**वस्तु मिलने के बाद तो निर्मूल्य हो जाती है..!*
सभी साधु सन्यासी अप्राप्त वस्तु को पाने के लिये दौड़े-भागे जा रहे हैं,, *आकर्षण अपरिचित का है*। आत्मा है पर दिख नहीं रही,, हवा है महसूस हो रही है, पर दिख नहीं रही है। *बून्द मिटना चाहती है सागर बनने के लिए,, मिट्टी पिटना चाहती है गागर बनने के लिए,, सोना तपना चाहता है निखरने के लिए,, आत्मा तपना चाहती है भगवान बनने के लिए।*
भगवान बनने का मार्ग अपरिचितों का मार्ग है जिसे पाने के लिए — कोई ध्यान कर रहा, कोई पूजा पाठ कर रहा, कोई उपवास कर रहा, कोई स्वाध्याय कर रहा जंगलों में, कोई हिमालय की चोटियों पर जाकर बैठा है, अपरिचित को पाने के लिए।





*पूजा-पाठ, ध्यान, आत्मा और परमात्मा के बारे में जितना झूठ और बेवकूफ बनाया जा रहा है, उतना आज से पहले नहीं बनाया।* ध्यान और परमात्मा के सम्बन्ध में सत्य कहा भी नहीं जा सकता,, जो भी कहा जायेगा वह कहने के कारण ही असत्य हो जायेगा। *कुछ है जिसे जाना जा सकता है, लेकिन कहा नहीं जा सकता।* जिस ध्यान और परमात्मा के सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता, उसके बारे में किताबों के ढ़ेर लगा दिये लोगों ने, शब्द भी असमर्थ है।
*हम जो शब्दों में कहेंगे, वह संसार के आगे नहीं जा सकता।* शब्द और भाषा में संसार से आगे की बात नहीं कही जा सकती। अभिषेक, पूजा, पाठ, मन्त्र जाप, स्वाध्याय, सत्संग, यह सब मार्ग है स्वर्ग जाने के। *ध्यान और परमात्मा गुंगे को गुड़ के स्वाद से ज्यादा नही है…!!!*
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
