पंच कल्याणक महोत्सव यथार्थ को दर्शाते हैं ये कोई नाटक नहीं है- मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज
कटनी —
जैनधर्म किसी व्यक्ति से सम्बन्ध नही रखता, ये किसी तीर्थंकरों से उत्पन्न नहीं होता, ये वस्तु का स्वरुप है, जब से सृष्टि से है तब से जैनधर्म है। इस धर्म की शरण मे आकर के जिनेंद्र बनते है, मुनि बनते है और इसे श्रमण संस्कृति के नाम से जाना जाता है, जिसमें हर व्यक्ति को भगवान बनने का अधिकार दिया जाता है। इसे किसी ने नही चलाया, ये सनातन प्रवाहमान है, ये अनादिकाल से चला आ रहा है और अनन्तकाल तक चलता रहेगा उक्त आश्य केउद्गार मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज कटनी पंच कल्याणक महा महोत्सव एवं विश्वशांति महायज्ञ गजरथ महोत्सव की विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए ।
नीलांजना नृत्य के देखकर प्रभु को हुआ वैराग्य
चेतनोदय तीर्थ पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एवं विश्वशांति महायज्ञ गजरथ महोत्सव के दौरान प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भ इया के मंत्रोच्चार के साथ ही महोत्सव के चतुर्थ दिवस में भगवान का तप कल्याणक मनाया गया इस दौरान आदि कुमार का विवाह राज्याभिषेक विभिन्न देशों के राजाओं द्वारा भेंट समर्पित की गई इसके बाद राज्य संचालन के साथ ही जगत को अषि मषि कृषि विद्या वाणिज्य एवं शिल्प का उपदेश के साथ ही दण्ड व्यावस्था ब्राह्मी सुन्दरी को अंक और अक्षर विद्या का ज्ञान कराया गया इसके बाद राज्य सभा में नीलांजना नृत्य के दौरान नीलांजना की मृत्यु को देखकर इस असार संसार से वैराग्य हो गया और वे वन की ओर प्रस्थान करने लगे तो देव उन्हें पालकी लेकर उपस्थित हो गये इसके बाद आदि कुमार की दीक्षा की विधि को परम पूज्य आध्यात्मिक संत निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्रीसुधासागर जी महाराज द्वारा पूरे विधि -विधान के साथ किया गया इस दृश्य को देखकर भक्तों की जय जयकार से अयोध्या नगरी गुंजायमान हो गई इस दौरान धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि पंच कल्याणक महोत्सव कोई नाटक नहीं है जो यथार्थ में होता है वहीं यहां किया जा रहा है ऐसा सत्य भी असत्य है जिसके बोलने से दूसरे पर विपदा आ जाए, दूसरे की बदनामी या इज्जत खराब हो जाये। दूसरे को नीचे दिखाने के लिए सत्य भी बोला जाए तो वह असत्य है। ऐसा झूठ भी सत्य है जिस झूठ के बोलने से किसी के प्राण या इज्जत बचती है। दृष्टि में वीतरागता, क्रिया में अहिंसा ये जैनधर्म का सोच है अपने पसीने की कमाई भी जिसे समर्पित कर दी जाए, उसी से सच्चा प्रेम होता है। प्रेमी तक प्रेम को सीमित मत रखों, प्रेम भगवान से, माँ बाप से, आत्मा से भी होता है।

महाराज श्री ने कहा उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में चारित्र को प्रधानता दी गई है चारित्र का शाब्दिक अर्थ है क्रिया और सम्यक चारित्र का अर्थ है समीचीन चारित्र, जिसमें स्व और पर दोनों का हित हो, वह सम्यक चारित्र कहलाता है।
चारित्र दो प्रकार का- एक इन्द्रिय संयम व एक प्राणी संयम। इन्द्रिय संयम में पंचेन्द्रिय के विषयों को वह संसार से मोड़कर परमार्थ की तरफ ले जाता है और प्राणी संयम में गृहस्थ त्रसों का, व्यर्थ स्थावरों का त्याग करता है, मुनिराज दोनों
का त्याग करते है, ये है बाह्य चारित्र की भूमिका। अभ्यन्तर चारित्र है- कषायों को रोकना देशव्रती के देशव्रत और अविरत सम्यकदृष्टि के कुलाचार सप्त व्यसन, रात्रिभोजन का त्याग व अष्टमूलगुण होते है।

उन्होंने कहा कि ज्योतिष ग्रह नक्षत्रो से सम्बोधित गणनाओ का विषय है वर्तमान में अलग से किसी आचार्य ने ज्योतिष शास्त्र नहीं लिखा पूर्णतः, प्रकीर्णक रूप से ज्योतिष शास्त्रों का वर्णन प्रथमानुयोग के ग्रन्थों में मिलता है। अलग से छोटी मोटी किताब मिलती है केवलज्ञान चूड़ामणि आदि ग्रन्थों में इसका उल्लेख किया गया है
*संसार के सभी जीव आहार ग्रहण करते हैं उनके छः प्राकार कहें है*
मुनि पुंगव ने कहा कि संसार के सभी जीव एक इन्द्री से लेकर पंच इन्द्री तक सभी आहार ग्रहण करते हैं आहार 6 प्रकार के होते हैं कवलाहार, मनसाहार, ओजाहार, लेपाहार, कर्माहार व नौकर्माहार। देवों का मनसाहार, नारकियों का नौ कर्माहार व कर्माहार, केवली भगवान का नौ कर्माहार, अंडों का ओजाहार, एकेन्द्रियों का लेपाहार, दो से लेकर संज्ञी पंचेन्द्रिय मनुष्य व तिर्यंचों का कवलाहार होता है। जिसके जो आहार होता है वही आहार माना जाएगा, अन्य आहार नहीं।
गुरुवार को परम पूज्य आध्यात्मिक संत निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज द्वारा सूरिमंत्र केवल ज्ञान की उत्पत्ति के साथ ही समवशरण की रचना होगी इस दौरान चेतनोदय तीर्थ कटनी में विजय कुमार विश्व बब्लू भइया परिवार द्वारा बनाये गये समवशरण की प्रतिष्ठा भी सभी के आकर्षण का केन्द्र होगा साथ ही परम पूज्य आध्यात्मिक संत निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज की मंगल देशना समवशरण से सुनने का सौभाग्य प्राप्त होगा ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
