शिष्य के लिए गुरु और गुरु के लिए शिष्य आवश्यक होते है |” -108 निर्यापक श्रमण श्री समतासागर महाराज जी

धर्म

“शिष्य के लिए गुरु और गुरु के लिए शिष्य आवश्यक होते है |”
-108 निर्यापक श्रमण श्री समतासागर महाराज जी
डोंगरगढ़
जिस प्रकार प्यासे को पानी की आवश्यकता होती है वैसे ही पानी की उपयोगिता भी तभी होती है जब कोई प्यासा हो | प्यासे को पानी न मिले तो उसका जीवन समाप्त हो जायेगा और पानी को प्यासा न मिले तो उसका भी वाश्पिकरण होकर उड़ जायेगा एवं उसका कोई महत्व ही नहीं रहेगा |

 

 

आचार्य श्री विद्यासागर जी ने 18 वर्ष की आयु में ये निश्चय कर लिया था की अपनी आत्मा को परमात्मा बनाना है और विद्याधर देशभूषण जी से ब्रह्मचर्य व्रत लेकर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी के पास ज्ञान प्राप्त करने चले गए थे | जब आचार्य ज्ञानसागर जी ने कहा की तुम विद्याधर हो ज्ञान प्राप्त करके उड़ गए तो | तभी विद्याधर ने आजीवन वाहन का त्याग कर दिया और आचार्य ज्ञानसागर जी ने उनको अपना शिष्य बना लिया और उनके इस त्याग को देखकर उनके उज्जवल भविष्य की सम्भावना को जान लिया |

 

 

विद्याधर की मातृभाषा कन्नड़ थी और आचार्य ज्ञानसागर जी की हिंदी | उन्होंने इस हीरे को ऐसा तराशा की वो कुछ ही वर्ष में मुनि विद्यासागर बन गए और फिर अपने जीवन के अंतिम समय में उनको आचार्य पद देकर संघ को गुरुकुल बनाने का आशीर्वाद दिया | आचार्य ज्ञानसागर जी की उत्कृष्ट संलेखना कराकर उन्होंने अपने संघ का विस्तार किया और चार छुल्लक दीक्षा देकर जगह – जगह विहार किया |

आज आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का संघ गुरुकुल की तरह है जिसमे सैकड़ो मुनि, आर्यिका, एलक, छुल्लक, ब्रह्मचारी भैया एवं ब्रह्मचारी दीदी है | जैसे शिष्य को गुरु की आवश्यकता होती है वैसे ही गुरु को ऐसे शिष्य की आवश्यकता होती है जो उनके संघ को आगे ले जाने में समर्थ हो ऐसी सम्भावना आचार्य श्री विद्यासागर जी ने नवाचार्य श्री समयसागर जी में देखा और उन्हें आचार्य पद पर सुशोभित करने का मन बना लिया जिसके लिए उन्होंने संघ के ज्येष्ठ मुनि को संकेत भी दिये | मुनि श्री ने कहा की नवाचार्य श्री समयसागर जी इस गुरुकुल का विस्तार 5 से 10 गुना बहुत जल्दी ही कर देंगे क्योंकि आचार्य श्री विद्यासागर जी ने उनको गुरुकुल में पुष्प पल्लवित करके दिया है | जबकि आचार्य श्री को संघ बनाने में 55 वर्ष लगे क्योकि उनको यह कार्य स्वयं ही अकेले किया और उस समय यह कार्य तिल से तेल नहीं रेत से तेल निकलने जैसा कठिन था |

 


चंद्रगिरी के अध्यक्ष सेठ सिंघई किशोर जैन, निर्मल जैन, सुभाष चन्द जैन, चंद्रकांत जैन, सप्रेम जैन, डोंगरगढ़ जैन समाज के अध्यक्ष श्री अनिल जैन, कोषाध्यक्ष श्री जय कुमार जैन, सचिव श्री यतीश जैन, सुरेश जैन, निशांत जैन, विद्यातन पदाधिकारी श्री निखिल जैन, दीपेश जैन, अमित जैन, सोपान जैन, जुग्गू जैन, यश जैन, प्रतिभास्थली के अध्यक्ष श्री पप्पू भैया सहित समस्त पदाधिकारी उपस्थित थे ।

 

विद्यातन के अध्यक्ष श्री विनोद बडजात्या ने बताया कि आज प्रातः 7 बजे मंगलाष्टक, भगवान का अभिषेक, पूजन, आरती, विधान हुआ | 9 बजे महाराज जी का प्रवचन हुआ तत्पश्चात आचार्य श्री के 108 अष्ट द्रव्य से निर्मित चरण चिन्ह की प्रतिष्ठा हुई | दोपहर में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी कि महापूजा एवं महाआरती हुई जिसमे बाहर से आये उनके भक्तों ने अष्ट द्रव्य से अर्घ्य समर्पण किया | शाम को भगवान के समवशरण में संगीतमय आरती हुई जिसमे भक्तों ने झूम – झूम कर नृत्य कर अपनी भक्ति प्रगट की | रात्रि 8 बजे से ब्रह्मचारी भैया का प्रवचन हुआ जिसमे उन्होंने संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी के उत्कृष्ट जीवन चर्या एवं जीव दया और संघ को किस तरह गुरुकुल बनाया आदि के बारे में बताया | फिर सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए | उक्त कार्यक्रम में जैन समाज के एवं अन्य समाज के लोग सम्पूर्ण छत्तीसढ़ एवं भारत के विभिन्न प्रान्तों से अपने गुरुवर के प्रथम समाधि स्मृति महोत्सव में शामिल हुए |

निशांत जैन (निशु) से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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