दया धर्म का मूल है और करुणा ही अहिंसा है आचार्य कनकनदी गुरुदेव

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दया धर्म का मूल है और करुणा ही अहिंसा है आचार्य कनकनदी गुरुदेव
सागवाड़ा
वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनदी गुरुदेव ने अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में योगेंद्रगिरी से बताया कि करुणा दान में कोई पात्र अपात्र की विवेचना नहीं होती है यह सब को दिया जाता है। करुणा दान जाति भेद मतभेद छोटा बड़ा पशु पक्षी मनुष्य सम्यक दृष्टि मिथ्या दृष्टि सबके भेदभाव से परे होता है। सभी जीवों की कल्याण के लिए दिया जाता है। सभी जीवों के कल्याण की भावना से तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता है। करुणा दान तीर्थंकर सबसे ज्यादा करते हैं हर जीव की सुरक्षा करना करुणा दान है। तीर्थंकरों के करुणा भाव अधिक होने के कारण उनके शरीर का खून सफेद रहता हैं। दया धर्म का मूल है। करुणा दान ही अहिंसा है।

 

दान तीर्थंकर से ही प्रारंभ होता है इससे पहले दान की प्रथा नहीं थी l भोग भूमि में प्राकृतिक जीवन था उसमें दान नहीं था l कर्मभूमि में तीर्थंकरों के आहार दान से दान प्रारंभ होता है अतः दान तीर्थ कहलाता है जो श्रावकों द्वारा दिया जाता है l दान स्वर्ग में नरक में भोगभूमि में नहीं दिया जाता है। दान सम्यक दर्शन से करने पर पुण्य बंध होता है। दान करना प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा है l

महाराज श्री ने कहा कि तीर्थंकर आदर्श पुरुष होते हैं l संस्कृति आध्यात्मिक होती है l जिस प्रकार मेघ बिना भेदभाव के सभी जगह समान वर्षा करते हैं वैसे सभी तीर्थंकर बिना भेदभाव के सभी को ज्ञान दान करते हैं l दीक्षा से पूर्व तीर्थंकर एक वर्ष तक कीमिच्छीक दान जिसको जो आवश्यकता हो वह दान करते हैं l

आचार्य विद्यानंद जी गुरुदेव की जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री कनकनदी गुरुदेव ने बताया कि तीर्थंकर प्रकृति के उदय के कारण तीर्थंकर दीक्षा से 1 वर्ष पूर्व ही दान देना प्रारंभ कर देते हैं जिस प्रकार तीर्थंकर नरक में हो तो उनके जन्म में आने से 6 माह पूर्व ही वज्र कोट उनकी रक्षा के लिए निर्मित हो जाता है। जन्म के 6 महापूर्व रत्न की वर्षा प्रारंभ हो जाती है। यह सबके लिए नहीं होता है तीर्थकरो के असामान्य पुण्य के कारण यह विशेष व्यवस्था होती है। वैराग्य होने के बाद एक वर्ष तक तीर्थंकर घर में नहीं रहते l तीर्थंकर मुनि अवस्था में उपदेश नहीं देते मौन रहते हैं तीर्थंकर केवल ज्ञान होने के बाद ही ज्ञान देते हैं l
मधुबाला मैडम की समस्या का समाधान करते हुए आचार्य श्री ने कहा खेत में हल चलाते हैं तो उनके बेल के ऊपर लकड़ी होती है जिसमें छेद होता है रस्सी डालते हैं उसको जुआ बोलते हैं जिस प्रकार लकड़ी और जुआ दोनों अलग-अलग दिशा में फेंक देने पर वह कुछ काम का नहीं रहता वैसे ही मानव जीवन मिलना दुर्लभ है उसे व्यर्थ नहीं गवाना चाहिए l

 

सम्यक दर्शन के बिना मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं l
विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी के साथ
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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