पूज्य मुनि श्री 108 अपूर्व सागर महाराज संघ एवम पूज्य मुनि श्री श्रृतधरनंदी महाराज सानिध्य में आदिनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाया गया
भिंडर
प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के निर्वाण ( मोक्ष ) कल्याणक के उपलक्ष्य में धर्मनगरी भींडर में श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन बड़े मंदिर जी में परम पूज्य वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री 108वर्धमानसागर महाराज के सुशिष्य प.पू. मुनि श्री 108अपूर्वसागर जी महाराज ससंघ एवम परम पूज्य आचार्य श्री 108 कुंथुसागर जी महाराज के सुशिष्य परम पूज्य मुनि श्री 108 श्रुतधरनंदी जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य एवं बा. ब्र. नमन भैया के निर्देशन मे श्रद्धालुओं द्वारा श्री जी का 23 द्रव्यों से भव्य पंचामृत अभिषेक , शांतिधारा,पूजन के साथ निर्वाण लाडू चढ़ाया गया।
इस अवसर पर श्री भक्तामर महा मंडल विधान भी किया गया। शांतिधारा करने का सौभाग्य श्री राजमल पचोरी परिवार एवं श्री सतीश सुनील कंठालिया परिवार ने प्राप्त किया। विधान में सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य श्री रंगलाल , इंद्रलाल , जयंतीलाल , अंजना देवी फांदोत परिवार को प्राप्त हुआ। निर्वाण लाडू अर्पित करने का सौभाग्य मंजुला देवी राजमल सुरावात परिवार और कुंताबाई गोवर्धन लाल वालावत ने प्राप्त किया
मुनि संघ ने अपने प्रवचन में भगवान ऋषभदेव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डाला । बताया की भगवान ऋषभदेव आदियुग के प्रथम तीर्थंकर हैं । जैन धर्म के इस काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव माने जाते हैं । भगवान ऋषभदेव का जन्म नवमीं में अयोध्या तीर्थ में राजा नाभिराय के यहां मरुदेवी माता से हुआ था । भगवान ऋषभदेव के 101 पुत्र थे जिनमें प्रथम भगवान से पहले मोक्ष प्राप्त करने वाले अनंतवीर्य थे । जिसमें ऋषभदेव को अपने साम्राज्य का भोग भोगने के समय नृत्यांगना
नीलांजना का नृत्य करते समय अकाल मौत हो जाने से वैराग्य हो गया । भगवान ने उसी समय संसार का मोह छोड़ सारा साम्राज्य अपने बेटे बाहुबली और भरत में विभाजित करने के बाद वन में कठोर तपस्या के लिए निकल गए । भगवान को वन में जाते देख कर नगर वासी एवं सेवक भी भगवान के साथ तप वस्त्र हटाकर 12 माह तक कठोर तपस्या की और फिर भी भगवान को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई ।
बताया की भगवान को छह महीने आहार नहीं मिला । आहार विधि का ज्ञान श्रावकों को नहीं होने के कारण उसके पश्चात राजा श्रेयांस द्वारा हस्तिनापुर नगरी में अक्षय तृतीया को इक्षु रस का आहार हुआ । इसीलिए आज भी उत्तर प्रदेश के मेरठ, हस्तिनापुर और आस-पास के क्षेत्रों में गन्ने का सबसे अधिक उत्पादन होता है । भगवान के दो पुत्रियां ब्राम्ही एवं सुंदरी थी । जिनको भगवान ने कृषि, एवं अक्षर ज्ञान गणित का पाठ पढ़ाया । दोनों पुत्रियों ने दीक्षा धारण कर आर्यिका बनना स्वीकार किया ।
भगवान ऋषभदेव को माघ वदी चतुर्दर्शी को कैलाश पर्वत पर दस हजार मुनि सहित मोक्ष निर्वाण हुआ । भगवान ऋषभदेव के दो विवाह हुए थे । जिसमें प्रथम पत्नी का नाम सुमंगला एवं दूसरी पत्नी का नाम सुनंदा था। प्रथम पत्नी से भगवान को 99 पुत्र हुए जिसमें सम्राट भरत चक्रवर्ती थे । द्वितीय पत्नी से भगवान को एक पुत्र बाहुबली स्वामी हुए जो कठोर तपस्या कर भगवान से पूर्व ही मोक्ष को पधारे । भगवान के पुत्र सम्राट भरत चक्रवर्ती के कारण ही हमारे देश का नाम भारत हुआ । भगवान ने वैराग्य से पूर्व अयोध्या का राज्य भरत को और पोदनपुर का राज्य बाहुबली में बांट दिया था । किन्तु दोनों पुत्रों में पोदनपुर राज्य के लिए भीषण युद्ध हुआ जिसमें बाहुबली विजयी हुए । भरत को परास्त करने के बाद, बाहुबली को बड़े भ्राता के हार जाने के बाद ग्लानि उत्पन्न हुई और संसार में होने वाली समस्त क्रियाओं से वैराग्य हो गया कि राज्य के लिए भाई को हराना सबसे बड़ा कारण रहा । उसी समय भगवान बाहुबली ने कठोर तपस्या कर केवल्य ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त हुए ।
महाराज श्री ने बताया की भगवान ऋषभदेव के सभी पुत्री व पुत्र कर्मकाट कर निर्वाण गए। एक समय राजा नामीराय द्वारा खेत में हल चलाने के लिए समय बैल द्वारा धान खाने के कारण ऋषभदेव द्वारा उनका मुंह बांध दिया गया था, उसी पाप के कारण भगवान को छह माह तक आहार नहीं मिला ।

अत: भगवान ऋषभदेव का प्रतीक चिन्ह भी बैल है प्रजा को प्रथम ज्ञान देने के कारण उनको आदि ब्रम्हा कहा गया । प्रजा को सबक सिखाने के लिेए उन्होने न्याय प्रणाली की शुरुआत भी की थी । इसीलिए उन्हें प्रजापति कहा गया ।
भगवान ऋषभदेव क्षत्रिय वंश से थे जिनका इश्वाकू वंश था ।

भगवान के शरीर का स्वर्ण रंग था,जो सोने से भी ज्यादा चमकता था । भगवान ऋषभदेव की तपस्या इतनी कठोर थी कि उनकी बाल की जटाएं भी शरीर तक पहुंच गई थी । इसी कारण उन्हें जटाधारी भी कहा गया । भगवान को वटवृक्ष के नीचे ही केवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ था । भगवान ने असि, मसी,कृषि, विद्या, वाणिज्य,शिल्प कला का ज्ञान सिखाया । भगवान ऋषभदेव, अनंत गुणों के भंडार हैं। इसकी महिमा का वर्णन हम कदापि नहीं कर सकते । भगवान के नाम मात्र के स्मरण से ही सारे पाप कष्ट मिट जाते हैं ।





समस्त कार्यक्रम में समाज के अध्यक्ष विमल प्रसाद लिखमावत, पूर्व अध्यक्ष पारसमल पचोरी, उपाध्यक्ष श्रीपाल हाथी सहित सभी श्रावक- श्राविका , युवा – युवतियों ने भक्ति भाव के साथ भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
