यह संसार पुण्य पाप का खेल है सुख और दुख कर्म के आधीन है प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
“यह संसार पुण्य पाप का खेल है, सुख और दुःख कर्म के आधीन है,आपके जीवन में किसी भी प्रकार की आपत्ति विपत्ति हो तो यह विचार करना कि यह मेरे हाथ में नहीं,उन आपत्ति और विपत्ति में अपने आपको संभालना तो मेरे हाथ में है, और उसको संभाले रखने का प्रयास करना,व्यर्थ है। इधर उधर हाथ पांव मारने से आप अपने आपको ही दुःखी करोगे और उसे कर्म का उदय मानकर उसको क्षय करने के लिये अपने आपको शुभ में लगाओ देखना आये हुये कर्म शीघ्र नष्ट हो जाएगे।”उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने आदिनाथ बाग स्थित रामचन्द्र नगर में व्यक्त किये।
मुनि श्री ने कहा कि “जब कर्म का तीव्र उदय होता है तो कोई निमित्त काम नहीं करता जब कर्म बदल जाता है तो सब कुछ ठीक हो जाता है। हम लोगों ने पुराणों में ढेर सारी कहानियां पड़ी है “राजा था रंक बन गया राजपाट खोना पड़ा वापिस पुण्य का योग आया और राजपाट मिल गया मुनि श्री ने कहा कि सबके जीवन में जो उतार चढ़ाव है,इसका नियंता मेरा अपना कर्म है इसलिये कभी परिस्थितियों को दोष मत दो उसको विधी का विधान मानकर चलोगे तो आपको प्रसन्नता बनी रहेगी उन्होंने कई उदाहरण दिये।

एक व्यक्ति ने लाटरी का टिकट खरीदा और सुबह सुबह अखबार में जब विज्ञप्ति पड़ी तो उसे ज्ञात हुआ कि उसकी एक करोड़ की लाटरी खुल गई तो वह फूला नहीं समाया और जब लोगों ने
उसको बधाई दी तो उसने भी जोरदार पार्टी दे दी दूसरे दिन जब अखबार आया तो उसमें भूल सुधार का कालम में जो लाटरी का नंबर था वह नंबर के स्थान पर दूसरा नं. था कल जिस बात पर उसको प्रसन्नता थी वही बात आज उसके दुःख में बदल गयी मुनि श्री ने एक और उदाहरण दिया पति पत्नी में बहुत अच्छे संबंध थे एक दूसरे पर जान छिड़कते थे अचानक दीपावली की सफाई में पति के हाथ पत्नी के तीस साल पुरानी उसके पूर्व प्रेमी की एक चिट्ठी हाथ लग गई पति ने पड़ा और उसकी त्योरियाँ चढ़ गई जिस पत्नी को वह दिल और जान से चाहता था वही पत्नी उसे कुलटा नजर आने लगी।
मुनि श्री ने कहा कि “विधी के विधान” पर अच्छे में भी विश्वास करो और बुरे में भी विश्वास करो। जब पुण्य के फल को स्वीकारते हो तो मीठे हों या कड़वे दोनों को स्वीकार करो।अच्छे बुरे दोनों अवसरों पर अपने आपको तटस्थ रखना सच्चे ज्ञानी की पहचान है।आपदा और सम्पदा दोनों सगी बहनें है पाप और पुण्य की स्थिति में समता बनाये रखना तुम्हारा धर्म है जिसको विधी के विधान पर विश्वास होता है वह विलखता नहीं है कर्म का उदय मानकर समता धारण करता है। परिवार में आई विपत्तियों को कोसो मत भगवान पारसनाथ के जीवन को देखो दस भव तक उनके ऊपर एक से बढ़कर एक विपत्तियां आई लेकिन उसे कर्म का उदय मानकर सहते रहे। मुनि श्री ने कहा कि विपत्तियों में घबराये मत बल्कि यह सोचिये यह मेरी परीक्षा की घड़ी है उपसर्ग साधुओं पर आते है डाकुओं पर नहीं कसौटी पर सोने को कसा जाता है पीतल को नहीं जब कभी भी परीक्षा की घड़ी आए तो अपने आपको सोना मानकर अपनी परीक्षा देना घबराइये मत यह तो कर्म का उदय है यह भी चला
जाएगा, सब कुछ नष्ट हो जाए लेकिन आपकी आत्मा का एक भी प्रदेश इधर से उधर विचलित नहीं हो सकता।
कर्म सिद्धांत पर विश्वास रखोगे और धैर्य रखोगे तो आयी हुयी विपदा और संकट शीघ्र टल जाएगे।
उपरोक्त जानकारी देते हुये धर्म प्रभावना समिति के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया मुनि श्री संघ सहित आदिनाथ बाग रामचन्द्र नगर में विराजमान है।रविवार की धर्मसभा में बहुत बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे धर्म प्रभावना समिति के अध्यक्ष अशोक रानी डोसी, मुकेश विजय पाटौदी,योगेन्द्र सेठी,दिलीप गोधा,सहित रामचंद्र नगर एवं समृति नगर के पदाधिकारियों ने गुरु चरणों में श्रीफल अर्पित किये मुनिसंघ का सांयकालीन शंकासमाधान रामचंद्र नगर में होकर रात्री विश्राम यही पर हुआ।
सोमवार को प्रातः मंगल विहार स्मृति नगर की ओर होकर मंगल प्रवचन एवं आहारचर्या उधर से ही संपन्न होगी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
