जीवनभर की साधना का फल समाधि सल्लेखना होती है।इस विचार से पूर्ण होकर परम गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज ने 22 नवम्बर 1972 में अपना आचार्य पद त्याग करके अपने ही योग्य शिष्य आचार्य श्री विद्यासागर जी को निर्यापकाचार्य के रूप में स्वीकार कर उनसे सल्लेखना व्रत स्वीकार किया जो उनके जीवन की उनकी साधना का सबसे बड़ा उपहार था। समाधि से 6 माह 10 दिन पूर्व ही उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया था। 23 मार्च 1973 में उन्होंने आचार्य श्री विद्यासागर जी के सहयोग से केशलोंच किया था। 20 मई 1973 में उन्होंने सभी प्रकार के खाद्य पदार्थो का त्याग कर दिया था। और 28 मई को उन्होंने चारो प्रकार के आहार के त्याग के साथ यम सल्लेखना व्रत अंगीकार किया और अपनी कषायों और काय को कृश करके जीवन का अंतिम फल पाकर 1 जून 1973 में ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन प्रातः 10 बजकर 50 मिनट में ज्ञानसूर्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज अपनी आत्मा की भावना भाते हुए समाधि में लीन हो गए। ऐसे जिनवाणी के लाल श्रमणों में तिलक स्वरूप आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरण युगल को नमन करते हुए उन जैसी हमारी भी समाधि हो यह भावना करता हूं।।
पहले अपनी आत्मा की भावना अच्छे से भाना चाहिए फिर प्रभावना की।।
*आचार्य श्री जी*
✍🏻..गुरुचरणानुगामी….
