हमने प्राप्त को पर्याप्त मान मन को समझ लिया तो हम दुख को दुख नहीं समझेंगे प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
कर्म” के खेल बड़े निराले होते है जब तक कर्म आपके अनुकूल होते है,तो आप प्रसन्न नजर आते हो, और थोड़ी सी प्रतिकूलता क्या आई कि आप दुःखी हो जाते हो,जो मनुष्य परिस्थितियों का रोना रोता है,वह जिंदगी भर दुःखी बना रहता है, संत कहते है कि सच्चे अर्थों में सुख दुःख बाहर की वस्तु नहीं, सुःख दुःख मन का है यदि हमने प्राप्त को पर्याप्त मान मन को समझा लिया तो हम दुःख को महसूस नहीं करेंगे, “जिसको विधी के विधान पर विश्वास होता है,वह निमित्तों से प्रभावित न होकर अपनी सोच को सकारात्मक रखता है।
उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने तिलकनगर स्थित कृष्णा पब्लिक स्कूल के प्रागंण में प्रातःकालीन धर्म सभा में व्यक्त किये।
मुनि श्री ने कहा कि पूरा खेल “मन” का है यदि हमने समझ लिया कि मेरे जीवन में जो कुछ भी घट रहा है वह संयोगाश्रित है,अनुकूल संयोग और प्रतिकूल संयोग हमारे आधीन नहीं है वह कर्म के आश्रित है, सुख बाहर नहीं है सुख भीतर है, जब आप सुख का स्वागत करते हो तो दुःख को भी स्वीकार करो।उन्होंने कहा कि महापुरुषों को भी कर्म के खेल को सहना पड़ा। भगवान पारसनाथ स्वामी का चारित्र देख लो दस भव तक उनको सहना पड़ा, मुनि श्री ने कहा कि अनुकूलता में खुशी मत मनाओ और प्रतिकूलता में फूलो मत दौनों ही स्थितियों में में”समता” को अपने अंतरमन में समाहित कीजिये, जो भी घट रहा है वह कर्माधीन है।

तत्व की समझ सोच व्यक्ती को सकारात्मक बनाती हैप्राप्त को पर्याप्त मानोगे तो जीवन में सुखी नजर आओगे, निमित्तों से अप्रभावित होंने की कला सीखिये, किसी घटना के घट जाने पर उसको बार बार दिमाग में मत लाइये। “नजरअंदाज” और “बरदाश्त” करने की कला आपके पास आ गई तो फिर कभी आप परेशान नहीं होगे।




उपरोक्त जानकारी देते हुऐ धर्म प्रभावना समिति के प्रवक्ता अविनाश जैन ने कहा कि दोपहर तीन से चार बजे तक पांडाल में समयसार का स्वाध्याय चल रहा है
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
