अन्तर्मना उवाच*

धर्म

*अन्तर्मना उवाच*

*दुनिया की खबर रखने वाला इंसान..*
*ज़िन्दगी के अन्तिम क्षणों तक,*
*अपने से — बेखबर बना रहता है..!*

 

 

 

इसलिए — सांझ होने से पहले एक दीप जला लेना। *आओ* अब घर लौट चलें, बाहर बहुत भटक लिये, अब इस भटकन का अंत करें। *सांझ होते ही पशु पक्षी भी अपने अपने घरों की ओर लौट आते हैं।* उन्हें भी पता है कि सुरक्षा अपने ही घर में है, तुम तो इंसान हो। अंधेरा गिरने वाला है, सूर्य ढ़ल चुका है, अंधेरा

आ रहा है, इससे पहले तुम अपने घर लौट आना। 

*कभी अपने भीतर झांककर यह भी देख लेना कि वहाँ क्या-क्या घट रहा है-?* भीतर वाले की खबर भी ले लेना, लेकिन *तुम तो भीतर वाले से एकदम बेखबर हो,* तुम भी — कभी कभी अपने घर — अपने आप में रहा करो, और देखा करो कि — वहाँ का संसार कैसा चल रहा है–? अपने भीतर में कैसे-कैसे भाव उठ रहे हैं–? अगर *भीतर में उठने वाले विचार शुभ है, तो समझ लेना तुम्हारा दीपक जल चुका है। और तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है, शुभ है।* यदि तुम्हारी भावनाएं शुद्ध है, भाव शुद्ध है, तो आगामी भाव भी शुभ ही होगा। और *यदि भीतर के भाव, भीतर के विचार अशुभ है, गंदे है, पाप पूर्ण है, क्लेश और संक्लेश मय है, तो फिर किसी ज्योतिषी से अपना भविष्य पूछने की जरूरत नहीं है। तुम्हारे भीतर के भाव ही बता रहे हैं, कि तुम्हारा भविष्य अंधकार में है।*

*आदमी के जैसे भाव होते हैं..*
*वैसे ही भव का सृजन होता है…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी 

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747315