प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज मुनि दीक्षा फागुन शुक्ला चतुर्दशी भाव भीनी विनायजली
परिचय
दिगम्बर साधु संत परम्परा में वर्तमान युग में अनेक तपस्वी, ज्ञानी ध्यानी सन्त हुए। उनमें आचार्य श्री शान्तिसागरजी महाराज एक ऐसे प्रमुख सन्त श्रेष्ठ तपस्वी रत्न हुए हैं, जिनकी अगाध विद्वता, कठोर तपश्चर्या, प्रगाढ़ धर्म श्रद्धा, आदर्श चरित्र और अनुपम त्याग ने धर्म की यथार्थ ज्योति प्रज्वलित की।
आपने जो किया व अभूतपूर्व है आपके द्वारा लुप्तप्राय, शिथिलाचारग्रस्त मुनि परम्परा का पुनरुद्धार कर उसे जीवन्त किया, यह निग्रन्थ श्रमण परम्परा आपकी ही कृपा से अनवरत रूप से आज तक प्रवाहमान है।

जन्म
आपका जन्म दक्षिण भारत के प्रसिद्ध नगर बेलगाँव जिला चिकोड़ी तालुका (तहसील) में भोजग्राम हुआ था। भोजग्राम के समीप लगभग चार मील की दूरी पर विद्यमान येलगुल गाँव में नाना के घर आषाढ़ कृष्णा 6, विक्रम संवत् 1929 सन् 1872 बुधवार की रात्रि में शुभ लक्षणों से युक्त बालक सातगौड़ा का जन्म हुआ था। आपको बता दे गौड़ा शब्द भूमिपति-पाटिल का द्योतक है। पिता भीमगौड़ा और माता सत्यवती के आप तीसरे पुत्र थे। इसी से मानो प्रकृति ने आपको रत्नत्रय और तृतीय रत्न सम्यकू चारित्र का अनुपम आराधक बनाया।

स्वप्न
जब आप बालक के रूप जब आप गर्भ रूप में आए, गर्भ में आने के बाद माँ सत्यवतीजी को एक सौ आठ सहस्त्र दल वाले कमल पुष्पों से भगवान की पूजा करने का उत्पन्न हुआ दोहला, जिसे विशेष प्रबन्धकर बहुत खर्च करके किया गया पूर्ण, बड़े बड़े कमल पुष्पों से जिनेन्द्र देव की पूजा की। उसके बाद उनकी माँ ने ठान ली थी की उनके पेट में पल रहा बच्चा जरूर होनहार होगा। सचमुच वह शुभ दोहला ही था की बालक भवितव्यता का द्योतक है।
बचपन
यदि उनके बचपन पर हम प्रकाश डाले तो सातगौड़ा बचपन से ही
वैरागी प्रकृति के थे। बच्चों के समान गन्दें खेलों में उनकी कोई रूचि नहीं थी। वे व्यर्थ की बात नहीं करते थे। पूछने पर संक्षेप में उत्तर देते थे। लौकिक आमोद-प्रमोद से सदा दूर रहते थे, धार्मिक उत्सवों में जाते थे। बाल्यकाल से ही वे शान्ति के सागर थे। इतना ही नही छोटी सी उम्र में ही आपके दीक्षा लेने के परिणाम थे, परन्तु माता-पिता ने आग्रह किया कि बेटा! जब तक हमारा जीवन है तब तक तुम दीक्षा न लेकर घर में ही धर्मसाधना करो। इसलिए आप घर में रहे।
व्यसाय में भी निष्प्रहता थी
आपकी मुनियों के प्रति अटूट भक्ति थी। इतना ही नही आप अपने कन्धे पर बैठाकर मुनिराज को दूधगंगा तथा वेदगंगा नदियों के संगम के पार ले जाते थे। वे कपड़े की दुकान पर बैठते थे, तो ग्राहक आने पर उसी से कहते थे कि-कपड़ा लेना है तो मन से चुन लो, अपने हाथ से नाप कर फाड़ लो और बही में लिख दो। इस प्रकार उनकी निष्प्रहता थी। आप कभी भी अपने खेतों में से पक्षियों को नहीं भगाते थे। बल्कि खेतों के पास पीने का पानी रखकर स्वयं पीठ करके बैठ जाते थे। फिर भी आपके खेतों में सबसे अधिक धान्य होता था। वे कुटुम्ब के झंझटों में नहीं पड़ते थे।
आजीवन ब्रह्मचर्य
वैराग्य पथ की और बढ़ते हुए आपने 18 वर्ष की उम्र में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत श्री सिद्ध सागर जी मुनिराज से लिया। साथ ही बिस्तर व जूते चप्पल का त्याग कर दिया।
आजीवन तेल धी त्याग तथा एक समय भोजन का आजीवन त्याग
आप सदैव निर्मोही प्रकृति के रहे, आपने ग्रहस्थ अवस्था मे 32 वर्ष की उम्र में अपनी बहन श्री कृष्णा जी के साथ सिद्ध क्षेत्र श्री सम्मेदशिखर जी की वंदना की। इसी उपलक्ष्य में आपने तेल और धी का आजीवन त्याग तथा एक समय भोजन एकासन का नियम मात्र 32 वर्ष की उम्र में लिया। जो उनकी निर्मोहिता बताता हैं।
गरीब अशक्त महिला को कराई यात्रा
आपका ह्र्दय सचमुच विशाल था, जिसका उदाहरण मिलता है, जब आप 32वर्ष की उम्र में शिखर जी की यात्रा कर रहे थे,तब उन्हे, रास्ते मे एक अधिक उम्र की बुढ़िया रो रही थी नजर आई, उसकी पहाड़ पर जाने व वंदना की कामना थी, किंतु शारीरिक रूप से कमजोर थी। गरीब होने से डोली के रुपये भी नही थे। तब आपने बुजर्ग महिला को कंधे पर बिठा कर शिखर जी की वंदना कराई। जो उनकी विशालता को बतलाता हैं। इतना ही नही जब आप राजगृही पर्वत की वंदना ग्रहस्थ अवस्था मे कर रहे थे तब एक बुजर्ग पुरूष को भी उठा कर पहाड़ की वंदना कराई।
संयम पथ की और बढ़ते कदम
आपने माता-पिता के स्वर्गस्थ होते ही आप गृह विरक्त हो गये, एवं मुनिश्री देवप्पा स्वामी से 41 वर्ष की आयु में कर्नाटक के उत्तूर ग्राम में ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी सन् 1913 को क्षुल्लक के व्रत अंगीकार किए। तब आपका नाम श्री शांतिसागर जी रखा गया। इतना ही नही आपको क्षुल्लक अवस्था में आपको कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब मुनिचर्या शिथिलताओं से परिपूर्ण थी। साधु आहार के लिए उपाध्याय द्वारा पूर्व निश्चित गृह में जाते थे। मार्ग में एक चादर लपेटकर जाते थे आहार के समय उस वस्त्र को अलग कर देते थे आहार के समय घण्टा बजता रहता था जिससे कोई विध्न न आए। इतना ही नही गृहस्थों को पड़गाहन की विधि ज्ञात न होने से वे वापस मंदिर में आकर विराज जाते थे। इस प्रकार निराहार 4 दिन व्यतीत होने पर ग्राम में तहलका मच गया तथा ग्राम के प्रमुख पाटील ने कठोर शब्दों में उपाध्याय को कहा-शास्त्रोक्त विधि क्यों नहीं बताते ? क्या साधु को निराहार भूखा मार दोगे! तब उपाध्याय ने आगमोक्त विधि बतलाई एवं पड़गाहन हुआ।
ऐलक दीक्षा
आपकी ऐलक दीक्षा नेमिनाथ भगवान के निर्वाण स्थान गिरनार जी की वंदना के पश्चात् इसकी स्थायी स्मृति रूप आपने स्वयम ऐलक दीक्षा ग्रहण की आपने किसी से ऐलक दीक्षा नही ली। साथ ही आपने ऐलक
के रूप में नसलापुर में चातुर्मास किया वहाँ से चलकर ऐनापुर ग्राम में रहे।
वर्ष 1920 में मुनि दीक्षा
सन 1920 में यरनाल मे पँचकल्याण महोत्सव होने वाला था वहाँ जिनेन्द्र भगवान के दीक्षा कल्याणक दिवस पर आपने अपने गुरुदेव श्री देवेन्द्रकीर्ति जी से मुनिदीक्षा ग्रहण की।
आचार्य पद
समडोली में श्री नेमिसागर जी महाराज की ऐलक दीक्षा व श्री वीरसागर जी महाराज की मुनि दीक्षा के अवसर पर समस्त संघ ने महाराज को आचार्य पद (सन् 1924) में अलंकृत कर अपने आप को कृतार्थ किया।
चारित्र चक्रवती
यह एक ऐसा पल था इतिहास के पन्नों पर अंकित रहेगा, यह पल था गंजपंथा का चातुर्मास के बाद सन् (1934) पञ्चकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस अवसर पर मौजूद धार्मिक संघ ने महाराज श्री को चारित्र चक्रवर्ती पद से अलंकृत किया।
सल्लेखना
वह पल आ गया जिसको लेकर तपस्या की जाती है। आपने जीवंत पर्यन्त, मुनिचर्या का निर्दोष पालन करते हुए 84 वर्ष की आयु में दृष्टि मंद होने के कारण सल्लेखना की भावना लिए, आचार्य श्री सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी जी पहुँचे। वहाँ पर उन्होंने 13 जून को विशाल धर्मसभा के मध्य आपने सल्लेखना धारण करने के विचारों को अभिव्यक्त किया। 15 अगस्त को महाराज ने आठ दिन की नियम-सल्लेखना का व्रत लिया जिसमें केवल पानी लेने की छूट रखी। 17 अगस्त को उन्होंने यम सल्लेखना या समाधिमरण की घोषणा की। तथा 24 अगस्त को अपना आचार्य पद अपने प्रमुख शिष्य श्री 108 श्री वीरसागर जी महाराज को प्रदान कर घोषणा पत्र लिखवाकर जयपुर (जहाँ मुनिराज विराजमान थे) पहुँचाया। आपने आचार्य श्री ने 36 दिन की सल्लेखना में केवल 12 दिन जल ग्रहण किया।
औऱ 18 सितम्बर 1955 को प्रातः 6.50पर ॐ सिद्धोऽहं का ध्यान करते हुए युगप्रवर्तक आचार्यं श्री शान्तिसागर जी ने नश्वर देह का त्याग कर दिया। संयम-पथ पर कदम रखते ही आपके जीवन में अनके उपसर्ग आये जिन्हें समता पूर्वक सहन करते हुए आपने शान्तिसागर नाम को सार्थक किया। एक संयोग कहा जाएगा कि 18 सितम्बर 1955 को आपकी समाधि हुई इसी 18 सितम्बर 1950 को बालक श्री यशवंत जी का सनावद में जन्म हुआ आज वह बालक आपकी अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा में पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी के रूप में देश में विख्यात महापुरुष है,जिसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।
आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज पर हुए कुछ उपसर्गों एवं परीषहों की संक्षिप्त झलकियाँ इस प्रकार हैं –
सर्प का उपसर्ग
जब आप क्षुल्लक थे तब कोगनोली के मंदिर में ध्यानस्थ थे, तब आपके शरीर से विशाल विषधर लिपट गया। बहुत देर तक क्रीड़ा करने के पश्चात् शांत भाव से वापस चला गया।
इतना ही नही एक बार मध्याह्न का
समय था कोन्नूर की गुफा में महाराज श्री सामायिक कर रहे थे एक उड़ने वाला सर्प आया और महाराज की जंघाओं के बीच छिप गया। वह लगभग तीन घंटे तक उपद्रव करता रहा। लेकिन आचार्य श्री ने अपनी स्थिर मुद्रा को भंग नहीं किया। जो उनकी साधना को दर्शाता है।
शेर का उपसर्ग
जब पूज्य महाराज श्री द्रोणगिरी के पर्वत पर रात्रि में महाराज जब ध्यान करने बैठे तभी एक सिंह आ गया वह प्रात: लगभग 8-9 बजे तक महाराज के सामने ही बैठा रहा। इस प्रकार मुक्तागिरी पर्वत पर भी जब महाराज ध्यान में रहते थे, शेर झरने पर पानी पीने आ जाता था। आचार्यश्री का कहना था कि भय किस बात का? यदि वह पूर्व का बैरी न हो और हमारी ओर से कोई बाधा या आक्रमण न हो तो वह क्यों आक्रमण करेगा? बिना किसी भय के आत्मलीन रहते थे।
मकोड़े का उपसर्ग
कोन्नूर के जंगल मे महाराज श्री धूप में बैठकर सामायिक कर रहे थे, इतने में एक बड़ा सा कीड़ा उनके पास आया और उनके पुरुष चिह्न से चिपट कर वहाँ का रक्त-चूसने लग गया। खून बहने लगा किन्तु महाराज डेढ़ घण्टे तक अविचल ध्यान में बैठे रहे।
चींटियों का उपसर्ग
एक समय जंगल के मंदिर में ध्यान करते वक्त असंख्य चीटियाँ उनके शरीर पर चढ़ गई।एवं देह के कोमल अंग-उपांग को एक-दो घंटे ही नहीं सारी रात खाती रहीं, तब वे महापुरुष साम्य भाव से परीषह सहन करते रहे। इतना ही नही एक बार एक अविवेकी श्रावक जो कपड़े से गर्म दूध का बर्तन पकड़े हुए था, उसने वह उबलता दूध महाराज की अंजुलि में डाल दिया। उष्णता की असह्य पीड़ा से महाराज की अंजुलि छूट गई और वे नीचे बैठ गये, किन्तु उनकी मुख मुद्रा पर क्रोध की एक रेखा तक नहीं उभरी। यह होती सरलता है। वही एक बार महाराज श्री को श्रावक की अज्ञानता के कारण नौ दिन तक पर्याप्त जल नहीं मिला। जिसके कारण उनकी छाती पर फफोले पड़ गए पर वे गंभीर और शांत बने रहे। दसवें दिन मात्र जल लेकर ही बैठ गए।
इतनी उनकी महानता थी मन भावुक सा हो जाता है, महाराज श्री दस-बारह वर्ष तक दूध और चावल ही मात्र लेते रहे। एक दिन किसी श्रावक ने पूछा-महाराज आप और कुछ आहार में क्यों नहीं लेते, तब महाराज बोले-जो आप देते हैं वही मैं लेता हूँ। दूसरे दिन श्रावकों ने दाल रोटी आदि सामग्री देनी चाही तो भी महाराज ने नहीं ली। पुन: पूछने पर बताया कि आटा, मसाला कब पिसा हुआ था? रात्रि में पिसा हुआ अन्न रात्रि भोजन के दोष का कारण बनता है। अत: पुन: मर्यादित भोजन प्राप्त होने पर ग्रहण करने लगे।
आचार्य श्री ने गृहस्थ अवस्था में ही 32 वर्ष की आयु में घी-तेल का आजीवन त्याग कर दिया था, उनके नमक, शक्कर, छाछ आदि का भी त्याग था।
9938 उपवास किये
आपने अपने 35 वर्ष के मुनि जीवन में 27 वर्ष 3 माह 23 दिन (9938) तक उपवास धारण किये।
व्रत उपवास
दिन। कितनी बार। योग
16 दिन के 3 बार 48
10 दिन 1 10
9 6 54
8 7 56
7 6 42
6 6 36
5 6 30
4 6 24
अंतिम 36 1 36
चरित्र शुद्धि। 1234
तीस चौबीसी। 720
कर्म दहन 3 बार। 468
सिंह निष्क्रीडित 3 बार। 270
सोलहकारण 16 बार 256
श्रुत पंचमी। 36
विधमान 20 20
दशलक्षण। 1 बार 10
सिद्ध प्रभु के 8
अष्टान्हिका। 8
गणधर व्रत 1452 केवल 200
अतिरिक्त व्रत 6372
कुल 9938
संस्मरण
दिल्ली में दिगम्बर मुनियों के उन्मुक्त विहार की सरकारी आज्ञा नहीं थी। अत: 10-20 आदमी हमेशा महाराज के विहार के वक्त साथ ही रहते थे। आचार्य महाराज को चतुर्मास के दो माह व्यतीत होने पर जब यह बात ज्ञात हुई तो महाराज ने स्वयं एक फोटोग्राफर को बुलवाया और ज्ञात समय के पूर्व अकेले ही शहर में निकल गये तथा जामामस्जिद, लालकिया, इंडिया गेट, संसद भवन आदि प्रमुख स्थानों पर खड़े होकर उन्होंने अपना फोटो खिचवाया। तब
समाज में अपवाद होने लगा की महाराज को फोटो खिचवाने का शौक है। इस विषय में महाराज से पूछे जाने पर उन्होंने ने कहा-हमारे शरीर की स्थिति तो जीर्ण अधजले काठ के समान है, इसके चित्र की हमें क्या आवश्यकता। और वह चित्र हम कहाँ रखेंगे। श्रावकों का कर्तव्य है कि इन चित्रों को सम्हाल कर रखें। जिससे भविष्य में मुनि विहार की स्वतंत्रता का प्रमाण सिद्ध हो सके। हमारे इस उद्योग से सभी दिगम्बर जैन मुनियों में साहस आवेगा, दिगम्बर जैनधर्म की प्रभावना होगी। हमारे ऊपर उपसर्ग भी आए तो हमें कोई चिन्ता नहीं। अच्छे कार्य करते हुए भी यदि अपवाद आये तो उसे सहना मुनि धर्म है न कि उसका प्रतिवाद करना।
आहारचर्या में दृढ़ता
आपने खानपान की शुद्धि के लिए
बाल विवाह, विधवा विवाह, विजातीय अंतर्जातीय विवाह,
शुद्ध जल सेवन का नियम देकर खानपान तथा समाज शुद्धि का पुरुषार्थ किया।
श्रुत सरक्षण
आपने धवला,जयधवला, टीका वाले, षटखंडागम, महाबंध कषाय पाहुड
ग्रन्थ त्रय को 50 मन तांबे के 2664 पत्रों पर अंकित कराया। जिन धर्म के श्रुत का सरक्षण किया।
अनेक दीक्षाए दी

आपने अनेको भव्य आत्माओं को व्रत-संयम ग्रहण कराकर उनके जीवन का उद्धार किया।
दीक्षित शिष्य
1 मुनि 28
1 मुनि श्री वीर सागर जी
2 श्री नेमी सागर जी कुड़चि
3 श्री नेमी सागर जी पुत्तर
4 श्री वृषभ सेन जी
5 श्री चंद्र सागर जी नांदगांव
6 श्री पाय सागर जी गोकाक
7 श्री कुन्थु सागर जी ऐना पुर
8 श्री नमिसागर जी शिवा पुर
9 श्री पारिस सागर जी गोकाक
10 श्री आदि सागर जी गया
11 श्री सुधर्म सागर जी चावली
12 श्री वर्धमान सागर जी भोज
13 श्री अनंत कीर्ति जी बेलगांव
14 श्री देव सेन जी
15 श्री सुरम्य सागर जी
16 श्री अजीत सागर जी
17 श्री धर्म सागर जी पच्छा पुर
18 श्री श्रुत सागर जी
19 श्री पद्म सागर जी
20 श्री देव सागर जी
21 श्री चंद्र सागर जी
22 श्री अनंत कीर्ति जी
23 श्री पाश्र्व कीर्ति जी
24 श्री समन्त भद्र जी
25 श्री अनंत सागर जी
26 श्री आदि सागर जी
27 श्री मल्ली सागर जी नांदगांव
28 श्री चंद्रकीर्ति जी अलवर
आर्यिका 6
1 आर्यिका श्री चंद्र मति जी
2 श्री विमल मति जी
3 श्री धर्म मति जी
4 एक गुलाब बाई को जयपुर में
दीक्षा दी
5 श्री। विद्या मति जी
6 श्री सिद्ध मति जी
ऐलक 16
1 श्री पारिस सागर जी गोकाक
2 श्री चंद्र सागर जी
3 श्री पायसागर जी पुत्तर
4 श्री पाश्र्व कीर्ति जी
5 श्री नमि सागर जी
6 श्री वर्धमान सागर जी
7 श्री सन्मति सागर जी
8 श्री नेमी सागर जी
9 श्री पाय सागर जी बेलगांव
10 श्री पायसागर जी गोकाक
11 श्री पायसागर जी ऐना पुर
12 श्री पाय सागर जी शिवा पुर
13 श्री अनन्त कीर्ति जी
14 श्री सुमतिसागर जी
15 श्री विमल सागर जी
16 श्री धर्म सागर जी
क्षुल्लक 28
1 क्षु श्री नेम कीर्ति जी
2 श्री ज्ञानसागर जी
3 श्री यशोधर सागर जी
4 श्री नेमी सागर जी
5 श्री शुभ चंद्र जी
6 श्री श्रुत सागर जी
7 श्री मल्लीसागर जी
8 श्री आदि सागर जी
9 श्री अनंत सागर जी
10 श्री विमल सागर जी
11 श्री अजीत कीर्ति जी
12 श्री पाश्र्व कीर्ति जी
13 श्री अजीत कीर्ति जी
14 श्री समन्त भद्र जी
15 श्री चंद्र कीर्ति जी
16 श्री अर्हद बली जी
17 श्री चंद्र सागर जी
18 श्री वीर सागर जी
19 श्री सुमति सागर जी
20 श्री पाय सागर जी
21 श्री अनन्त कीर्ति जी
22 श्री भव्य सागर जी
23 श्री सन्मति सागर जी
24 श्री देव सेन जी
25 श्री अमोघ सागर जी
26 श्री सीमंधर सागर जी
27 श्री सिद्ध सागर जी
28 श्री भद्रबाहु जी
क्षुल्लिका 15
1 क्षु श्री शांति मति जी
2 श्री अनंत मति जी
3 श्री चंद्र मति जी
4 श्री विमल मति जी
5 श्री अजीत मतिजी
6 श्रीकुन्थु मति जी
7 श्री जिन मति जी
8 श्री सुमति मति जी
9 श्री ज्ञानमती जी
10 श्री पाश्र्वमति जी
11 श्री विद्यावती जी
12 श्री अनंत मति जी
13 श्री राजमति जी
14 श्री जिनमती जी
15 श्री गुण मति जी
योग 93
चातुर्मास
सन स्थान
1 1915 कोगनोली क्षुल्लक
2 1916 कुम्भोज
3 1917 कोंगनोली
4 1918 जैनवाड़ी
5 1919 नसलापुर ऐलक
6 1920 कोंग नोली मुनि
7 1921 नसलापुर
8 1922 ऐना पुर
9 1923 कौनुर
10 1924 सम डोली आचार्य
11 1925 कुम्भोज बाहुबली
12 1926 नादणी
13 1927 कुम्भोज
14 1928 कटनी mp
15 1929 ललितपुर up
16 1930 मथुरा
17 1931 देहली
18 1932 जयपुर
19 1933 व्यावर्
20 1934 उदयपुर
21 1935 गौरेल
22 1936 प्रतापगढ़
23 1937 गजपंथा जी चा चक्र
24 1938 बारा मति
25 1939 प्रतापगढ़
26 1940 गौरेल
27 1941 अकलुज
28 1942 कोरोचि
29 1943 डिगर्ज
30 1944 कुथल गिरी
31 1945 फलटण
32 1946 कवलाना
33 1947 सोलापुर
34 1948 फलटण
35 1949 कवलाना
36 1950 गजपंथजी
37 1951 बारा मति
38 1952 लोणद
39 1953 कुथल गिरी
40 1954 फलटण
41 1955 कुथल गिरी
व्रत परिसंख्यान
एक बार आचार्य श्री ने मिट्टी के कलश पर श्रीफल रखकर पड़गाहन की विधि ली 8 दिन तक विधि नही मिली। अगले दिन बहुत गरीब जिसके पास कलश धातु का नही था। मिट्टी के कलश से पड़गाहन किया। और भाग्यशाली श्रावक के यहाँ विधि मिल गई आहार अच्छे से हो गया।
2 ग्वालियर में शीत ऋतु में कई दिनों के बाद आहार होना था
विधि यह थी कि गीले कपड़ो में कोई पड़गाहन करे 2 राउंड हो गए विधि नही मिली समाज की भीड़ भी बहुत हो गई सोले वाले श्रावक को किसी ने छू टच कर दिया सामने से आचार्य श्री आते दिखे तत्काल श्रावक ने पानी का घड़ा उड़ेल कर कपड़े पूरे गीले कर लिए पुण्योदय से आहार की विधि मिल गई निरन्तराय आहार हुआ
3 कोल्हापुर में एक जवाहरात के व्यापारी का मन हुआ कि में सोने चांदी के द्रव्य से पड़गाहन करूँगा
उधर संयोग वश आचार्य श्री ने भी यही विधि ली विधि मिल गई आहार प्रारम्भ हो गया तभी उस श्रावक को ध्यान आया कि जवाहरात की थाली तो बाहर ही रखी है भीतर लाया ही नही श्रावक का ध्यान बाहर था आचार्य श्री उसकी मनोदशा समझ रहे थे इस बीच मंदिर के पुजारी ने वह थाल सुरक्षित भीतर रख दी थी सच है कि जहाँ आचार्य परमेष्ठी के चरण हो वहाँ अनिष्ट हो नही सकता है
उसके बाद आचार्य श्री ने दोबारा ऐसी विधि नही ली
ऐसे बहुत संस्मरण है जिन्हें पढ़कर मन अगाध श्रद्धा से मन दिल झुक जाता है
धन्य धन्य धन्य हो प्रभु।
गुरुणा गुरु
श्री सात गोड़ा जी ने सन 1915 में मुनि श्री देवेंद्र कीर्ति जी से क्षुल्लक दीक्षा तथा वर्ष 1920 में मुनि दीक्षा ली थी आप सन 1924 में आपका चतुविद संघ होने से आपको आचार्य बनाया गया। आपकी आगम अनुरूप चर्या देख कर दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी ने आपसे पुनः मुनि दीक्षा ली इस कारण आपको गुरुणा गुरु कहा जाता है। वही वर्ष 1925 में आप श्रवणबेलगोला महामस्तकाभिषेक में भी शामिल हुए थे।
विशेष

प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी गुरुदेव की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधिश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी ने वर्ष 2020 का चातुर्मास यरनाल में किया था। वहाँ सन1920 में मुनि दीक्षा होने से मुनि दीक्षा शताब्दी वर्ष पूरे भारत मे विभिन्न गौरवशाली परम्परा अनुसार मनाए गया। वहाँ पर आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा स्थापित भी की गई है।
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
