परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज अतिथि का यथार्थ परिलक्षित किया

धर्म

अतिथि संस्मरण

परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज
उन दिनों फिरोजाबाद मे थे उनके प्रतिदिन होने वाली लोगो को दे दी जाती थी और विषय भी बता दिया जाता एक दिन आयोजको ने सुचना पटल पर लिख दिया की कल गुरुवर के प्रवचन अतिथि विषय पर होगे जब दुसरे दिन लोग वहा पहुचे तब माँलूम हो गया महाराज का तो विहार हो गया
सभी लोग वाहनों द्वारा उनके पीछे पीछे भागे दो तीन किलोमीटर जाकर जब सभी ने महाराज श्री से मिले तो पुछा महाराज आपका प्रवचन तो अतिथि विषय पर होना था आपने अचानक विहार कर दिया गुरुवर मुस्कान देने लगे बोले भया वही तो कर रहा हु अतिथि का अर्थ यही होता है की जिसके आने जाने की तिथि निश्चित नहीं होती
तभी लोग समझ गये आज तो अतिथि की तरह स्वयम आचरण करके महाराज ने हमको उपदेश दिया की जो कुछ कहो उसे चरितार्थ भी करो स्वयंम जी कर कहना ही सच्चा उपदेश है
फिरोजाबाद (1975 )
पुस्तक आत्मान्वेषी
मुनि श्री क्षमासागरजी महाराज

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी

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