रामगंजमंडी नगर में पूज्य मुनि श्री नीरज सागर महाराज एवं निर्मद सागर महाराज का हुआ भव्य मंगल प्रवेश रामगंजमंडी का नाम काफी वजनदारी है निर्मद सागर महाराज
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के परम शिष्य एवम आचार्य श्री 108 समय सागर महाराज के आज्ञानुवृत्ति शिष्य पूज्य मुनि श्री 108 नीरज सागर महाराज एवं पूज्य मुनिश्री 108 निर्मद सागर महाराज का रामगंजमंडी नगर में मंगल प्रवेश हुआ महाराज श्री संघ के नगर आगमन से नगरवासियों में काफी हर्ष व्याप्त था पूज्य महाराज श्री का नगर सीमा पर स्थित कमल फिलिंग स्टेशन पेट्रोल पंप पर पहुंचने पर एवम जय जयकार के साथ बेंड बाजो के साथ नगर के प्रमुख मार्गो से होते हुए श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर लाया गया जहां महाराज श्री ने शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा को एक टक निहारा जगह जगह महाराज श्री संघ का पद प्रक्षालन एवं मंगल आरती कर उनकी आगवानी की पूज्य महाराज श्री संघ ने महावीर दिगंबर जैन मंदिर के भी दर्शन किए शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर परिसर में धर्मसभा भी हुई यहां सर्वप्रथम मंगलाचरण रुचि बागड़ियां ने किया मंगलाचरण उपरांत आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन बाहर से पधारे हुए अतिथि एवं समाज के वरिष्ठ जन द्वारा किया गया। इस अवसर पर आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का पूजन भक्ति भाव से किया गया पूजन शोभित जैन के द्वारा सम्पन्न की गई। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज रामगंजमंडी की और से महाराज श्री संघ के समक्ष शीतकाल प्रवास का निवेदन करते हुए श्रीफल समर्पित किया गया। धर्म सभा का संचालन राजकुमार गंगवाल एवम प्रशांत जैन आचार्य ने किया।
सर्वप्रथम मंगल प्रवचन देते हुए पूज्य मुनिश्री 108 निर्मद सागर महाराज ने रामगंजमंडी नगर के विषय में बोलते हुए कहा कि रामगंजमंडी का नाम बहुत बड़ा है और नगर काफी पुराना है रामगंजमंडी का नाम वजनदारी है, उन्होंने राम शब्द के विषय में कहा कि राम शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। यहा की प्रतिमा काफी प्राचीन है। उन्होंने कहा कि धर्म बाहर की चीज नहीं है, अंदर की चीज हे। जिसके अन्दर आत्म तत्व जागृत हो जाता है वह श्रेष्ठ हो जाता है। जहां विशेषता एवं विशेषण जुड़ जाता है वहा अहंकार हो जाता है। हमारे जीवन में समर्पण आना चाहिए सेवा करते हुए अहंकार नहीं आना चाहिए जीवन में सरलता एवं सहजता आनी चाहिए। झुकता वही है जिसमें जान है।
पूज्य मुनि श्री नीरज सागर महाराज ने कहा कि पुण्य के उदय से सब प्राप्त होता है। अंतरंग के भावो में जब तक श्रद्धा लगन नहीं होगी तब तक हमें फल प्राप्त नहीं होता शब्द हमारी अभिव्यक्ति का साधन है। अंतरंग की भाषा में करुणा का श्रोत बह रहा है वही भक्ति है। शब्दों में बनावट दिखावटी बना है। चापलूस लोगों





की भाषा मिलावटी होती है।
उन्होंने आचार्य श्री ज्ञान सागर महाराज के विषय में कहा उन्होंने अहम का त्याग कर अपना जीवन अरहम की और अग्रसर करते हुए जीवन का निसर्ग किया अक्षर भी उनसे हुए और अक्षरों को आत्मसात कर लिया और सभी पदो का त्याग कर दिया और आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने श्रमण परंपरा को आगे बढ़ाया।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
