7000 बच्चों के ऊपर पूज्य मुनिश्री के कर कमलों से मौजी बंधन संस्कार हुए आचार्य श्री विद्यासागर जी हम शिष्यों व भक्तों के पुण्य से आचार्य बने : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज

धर्म

7000 बच्चों के ऊपर पूज्य मुनिश्री के कर कमलों से मौजी बंधन संस्कार हुए आचार्य श्री विद्यासागर जी हम शिष्यों व भक्तों के पुण्य से आचार्य बने : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज
सागर, मध्य प्रदेश

तीर्थ चक्रवर्ती जगत पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासगरजी महाराज के सानिध्य में भाग्योदय तीर्थ में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी का 53 वा आचार्य पदारोहण दिवस एवं मौजी बंधन संस्कार संपन्न हुआ ।

 

 

सर्वप्रथम प्रातःकालीन बेला में श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा हुई तत्पश्चात सागर के समस्त महिला मंडलों द्वारा आचार्य श्री की पूजन हुई और पाठशाला के बच्चों द्वारा आचार्य पद प्रसंग की लघु नाटिका प्रस्तुत की गई उसके बाद मुनिश्री के प्रवचन आरम्भ हुए ।

महाराज श्री ने कहा महान आदमी दो प्रकार के होते हैं एक वह जो अपने आप में महान होते हैं, वह अपनी साधना, अपनी तपस्या, अपने पुण्य से आगे बढ़ते हैं। दूसरी महान आत्मा वो होते हैं जो निमित्त की शक्ति से महान बनते हैं, निमित्त की शक्ति उपादान शक्ति को जाग्रत करती है। निमित्त का अपने आप में इतना बड़ा पुण्य होता है कि महान आत्मा की उस शक्ति को जागरण करता है, जो शक्तियाँ उनमे थी लेकिन वे स्वयं जागृत नहीं कर पाते, जैसे तीर्थंकर प्रकृति है वह प्रकृति कभी आत्मकल्याण भाव से नहीं जागेगी, वह भव्य जीवों के पुण्य से तीर्थंकर की शक्ति किसी आत्मा में जागती है। वह महावीर स्वामी का पुण्य नहीं है, वह पुण्य भक्तों के पुण्य से उनको इस प्रकार का पुण्य बंध जाता है।

महाराज श्री ने कहा कि मैने आचार्य श्री से कहा था कि आप मुनि बने हो, अपने पुण्य से व पुरुषार्थ से लेकिन आचार्य बने हो वो हम सब भक्तो के पुण्य से बने हो। हम लोगों की भवितव्यता ने एक मुनि महाराज को आचार्य पद पर प्रतिष्ठापित किया। तीर्थंकर पद आचार्य पद ये नैमित्तिक पद हैं, ये आत्मकल्याण में किंचित मात्र भी साधक नही है। हम उत्तरवासियों का इतना पुण्य था कि दक्षिण में जन्म लेने वाला व्यक्ति उत्तर में आ गया।

आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज ने उन् मुनि विद्यासागर का सारा व्यक्तित्व, सारा ज्योतिष देखा तो देखकर उन्होंने मन बना लिया। जो अच्छे साधु होते है उन्हें आचार्य पद के लिए मनाना पड़ता है, समाज, सब संघ मनाता है। प्रायः प्रायः मूल आचार्य पद संघो ने बनाये है। पूज्य आचार्य शांतिसागर जी महाराज को उन्ही के दीक्षित साधुओ ने आचार्य बनाया था क्योंकि कोई परम्परा नही थी। वीरसागर जी की समाधि के बाद शिवसागर जी को और शिवसागर जी की समाधि के बाद धर्मसागर जी को संघ ने आचार्य बनाया क्योंकि उनके आचार्य की आकस्मिक समाधि हो गयी।

 

प्रवचन के बाद दोपहर में मौजी बंधन संस्कार शुरू किया, और इसमें लगभग 7000 बच्चों के ऊपर पूज्य मुनिश्री के कर कमलों से संस्कार प्राप्त हुए।जो एक इतिहास लिख गया।
किसी भी आयोजन की भव्यता को देखकर लोग कहते हैं कि रिकार्ड भीड़ थी आयोजन ऐतिहासिक था किंतु निर्यापक मुनि सुधासागर जी महाराज प्रभावना के मानो पर्यायवाची हो गए हैं उनके आज के मौजी बंधन के कार्यक्रम में न सिर्फ ऐतिहासिक भीड़ थी बल्कि ऐसा लगता हैं कि रिकार्ड के भी रिकॉर्ड टूट गए
आयोजको के बताए अनुसार 7200 बच्चों का रजिस्ट्रेशन हुआ, आश्चर्य इस बात का हैं कि सभी बालको के उत्तरार्ध को स्वयं निर्यापक श्रेष्ठ ने अपने वरद हस्तो से मंत्रोच्चार पूर्वक अभिमंत्रित किया।

भाव अभिव्यक्ति देते हुए श्रीश जैन ललितपुर बताते हैं कि नजारा देखने लायक था सुबह में 10 बजे सागर पहुँचा तो मैने देखा कि जहां भी नजर जा रही हैं मुंडन किया हुआ चिकना सिर दिखाई दे रहा है ,,, कमाल की बात यह थी कि मात्र कुछ दिनों की सूचना पर 7200 बालकों का पहुँचना ही एक नए इतिहास के सृजन को दिखाता हैं और उससे भी बड़ा इतिहास यह बना जब स्वयं जगत पूज्य एकाशन में विराजमान हो गए और पूरे 7200 बालको को अभिमंत्रित करने लगें,,,
बच्चों को धोती दुपट्टा और रजत सिक्का देकर सम्मानित करते हुए पूरी सागर जैन पंचायत व समाज अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रही थी इस आयोजन की अभूतपूर्व सफलता ने एक बार और सिद्ध कर दिया कि निर्यापक मुनि पुंगव सुधासागर जी महाराज ही हैं जो न सिर्फ आचार्य श्रेष्ठ के लाडले हैं बल्कि जन जन के लाड़ले भी हैं
एक छोटे से बालक को मैने पूंछा कि जानते भी हो मोजी बंधन का क्या महत्व हैं तो उसका उत्तर मेरे मन को आनंदित कर गया उसने कहा कि मेरे गुरु का मेरे सर पर हाथ रखकर किसी भी नियम को देना और मेरा निस्वार्थ भाव से उस नियम को शिरोधार्य करना ही मौजी बंधन कहलाता हैं,,, आश्चर्य की बात तो यह थी कि इतने बड़े पांडाल में ठंड होने के बाबजूद भी पसीने आ रहें थे और छोटे छोटे बच्चें बगैर खाएं पिये भी तीन से चार घण्टे केवल इसी आशा में बैठे रहें कि निर्यापक श्रेष्ठ का हाथ सर के ऊपर तो रखा ही जायेगा
गुरुदेव की छत्रछाया यू ही सदा बनी रहें।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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