मैं कोशिश, प्रयास और प्रयत्न को ही,कार्य की सफलता मानता हूं..हार कर बैठ जाना मेरी फितरत में नहीं है..!*अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागर महाराज
कुलचाराम हैदराबाद
अंतरमना आचार्य श्री 108 प्रसंग सागर महाराज ने अपनी मंगल वाणी में कहा किमैं कोशिश, प्रयास और प्रयत्न को ही,कार्य की सफलता मानता हूं..हार कर बैठ जाना मेरी फितरत में नहीं है..!
उन्होंने कहा की जीवन में अनेक बार अच्छी बुरी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कभी अच्छा वक्त तो कभी बुरे वक्त के दौर से गुजरना पड़ता है।ये सिर्फ हमारी और आपकी बात नहीं है। जितने भी महापुरुष हुये हैं, ऐसा एक भी महापुरुष नहीं हुआ जिसने बुरे वक्त का सामना नहीं किया हो।
महाराज श्री ने जीवन के विषय में बताते हुए कहा कि जीवन मे सुख है तो दुःख भी है, जीत है तो हार भी है, अपने है तो पराये भी है, रात है तो दिन भी है, अमृत है तो जहर भी है, पूर्णिमा की चांदनी है तो अमावस की कालिमा भी है, फूल है तो कांटे भी है, इनसे कोई आज तक बच नहीं पाया। अपने तो वे होते हैं जो दुःख में दु:खी हो जाते हैं और सुख में सुखी। लेकिन आज हाल इससे विपरीत है ।
इसका उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे – अपना बेटा रोये तो दिल में दर्द होता है और पड़ोसी का बेटा रोये तो सिर में दर्द होता है, अपनी बीबी रोये तो सिर में दर्द होता है और पड़ोसी की बीबी रोये तो दिल में दर्द होता है।
_सौ बात की एक बात_ –
जीवन का वास्तविक सुख दूसरों को सुख देने में है, उनका सुख चैन छीनने झपटने में नहीं है…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312








