जीवन की वास्तविकता का बोध ही जीवन को समाधान देता है”-मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज

धर्म

“जीवन की वास्तविकता का बोध ही जीवन को समाधान देता है”-मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज
इंदौर
“जिस व्यक्ती के अंदर दूसरों को क्षमा करने तथा दूसरों की गलतियो को नजर अंदाज करने का भाव रहता है वह व्यक्ती कभी दुःखी नहीं रहता” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने गोयल नगर जैन मंदिर में प्रातःकालीन धर्म सभा में व्यक्त किये।

 

 

मुनि श्री ने चार प्रकार के दुःखों का वर्णन करते हुये कहा कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में चार प्रकार के दुःख नजर आऐंगे जिसमें पहला है कल्पना जन्य दुःख,दूसरा है अभाव जन्य,तीसरा वियोग जन्य तथा चौथा है परिस्थिति जन्य।
उन्होंने कहा कि आप लोगों में आदत होती है कि वर्षों पहले की घटनाओं तथा बुरी स्मृतियों को याद करके अपने आपको दुःखी करते हो या भविष्य की चिंता में अपने आपको दुःखी करते रहते हो अरे जो बीत गया उसे क्या याद करना,अतीत की उन बुरी स्मृति या दुर्घटना को विस्मृति में बदल कर उसे क्षमा करने की तथा किसी ने कुछ कहा उसे “नजरअंदाज़” करने की आदत यदि आ जाएगी तो आपके सारे दुःख दूर हो जाएगे,

 

मुनि श्री ने कहा कि जिन बातों के अभाव में तुम अपने आपको दुःखी मानते हो,यदि गहराई से देखोगे तो उन्ही बातों से सामने वाला ज्यादा दुःखी नजर आता है” उन्होंने कहा कि अभाव जन्य या वियोग जन्य “परिस्थितियों का रोना- रोना बंद कीजिये” इस संसार में
कोई तन दुःखी है, तो कोई मन दुःखी,कोई धन दुःखी है तो कोई धन को जोड़ने में दुःखी नजर आ रहा है।उन्होंने बारह भावना की तीसरी भावना सुनाते हुये कहा “दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णा-वश धनवान,कहूं न सुख संसार में, सब जग देख्यो छान।। जिस धन को पाने के लिये निर्धन दुःखी है उसी धन को और बढ़ाने में धनवान दुःखी है, घर घर की यही कहानी है, जीवन में बहुत कम लोग ऐसे होते है, जिनको उनकी इच्छानुसार वस्तुऐं मिल जाती है? उन्होंने पूछा क्या आपका जन्म आपकी इच्छानुसार हुआ? माता पिता आपकी इच्छानुसार मिले? फिर भी आप उन सभी को अपना मान लेते हो क्यों कि यही जीवन की वास्तविकता है,

 

मुनि श्री ने सूत्र देते हुये कहा कि “कोई मुझसे कुछ न कहे यह मेरे हाथ में नहीं,लेकिन कोई कितना भी कुछ कहे, में कुछ न कहु यह मेरे हाथ में है, मेरे जीवन में कोई दुःख प्रसंग न घटे यह मेरे हाथ में नहीं,मेरे जीवन में कितनी बड़ी घटना या दुःख प्रसंग या दुर्घटना घट जाए मै उससे विचलित न होऊ यह मेरे हाथ में है” मन की स्थरिता का पाठ हमें धर्म पढ़ाता है जो धर्म को धारण कर लेता है वह अतीत की स्मृतियों में नहीं उलझता तथा अतीत की घटित घटनाओं से नसीहत लेकर चिंता से मुक्त होकर भविष्य को अच्छा बना लेता है।

 

मुनि श्री ने कहा कि भूत और भविष्य को छोड़कर वर्तमान को देखो सचेष्ट होकर जिओ ,मुनि श्री ने कहा कि अज्ञानता और नकारात्मकता आपको दुख प्रदान करता है वही सकारात्मकता और तत्वदृष्टी आपको प्रत्येक दुःख से उबारने की शक्ति प्रदान करती है।

 

उन्होंने श्रवणबेलगोला में घटित एक घटना का जिक्र करते हुये कहा कि अपने पुत्र को खो चुकी एक मां ने कहा कि “मेरे और मेरे बेटे का बस इतना ही संयोग था” मुझे इस बात का दुःख नहीं कि मेरा बेटा चला गया मुझे इस बात की खुशी है कि मेरा बेटा जाते जाते भगवान की सेवा करके गया है। मैं आचार्य गुरुदेव विद्यासागरजी महाराज की शिष्या हूं और उन्होंने मुझे यही तत्वदृष्टी दी है। मुनि श्री ने कहा कि जिन बातों के अभाव में आप अपने आपको दुःखी महसूस करते हो यदि गहराई में जाकर देखोगे तो उसका सदभाव ही उसके दुःख का कारण है। उन्होंने कहा कि यदि आप धन को सुख का साधन मानते हो तो हमारे पास तो कुछ भी नहीं बोलो आप सुखी हो या हम सुखी है? उन्होंने कहा कि मन सदभाव ही हमें सुख तथा मन का अभाव ही हमें दुखी बनाता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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