सच्चा पुरुषार्थ करके आप अपने भाग्य की लकीरें बदल सकते हैं सुधा सागर महाराज
सागर
भाग्योदय तीर्थ में मंगल प्रवचन देते हुए शुक्रवार की बेला में निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 सुधा सागर महाराज ने कहा कि प्रकृति ने अपने दो भाग किए, जीवन-जन्म-मरण जो भी विधि है वह स्वभाविक रूप से है, जितने गुण है उनमें न घटा सकते हो, न बढ़ा सकते हो। जीव, जीव ही रहेगा और पुद्गल, पुद्गल ही रहेगा। अब हमारे हाथ में दो चीजे दी, पहले चीज दी है कि तुम भविष्य की अपनी किस्मत बनाओ, भविष्य में क्या करना चाहते हो अपनी एफडी बनाओ, जिसे बोलते है भाग्य, कर्म और किस्मत और दूसरी व्यवस्था की, यदि तुम्हारे भाग्य में कुछ गलत लिखा
है, तुम्हारा भाग्य ठीक नहीं है तो तुम्हें पुरुषार्थ नाम की एक चीज दी।
प्रकृति, भाग्य और पुरुषार्थ इन तीन चीजों से सृष्टि को समझना है। प्रकृति बोलते है जो नेचुरल है, अकृत्रिम है, किसी के द्वारा बनाया हुआ नही है तो जैन दर्शन कहता है सबसे पहले प्रकृति को समझो। ये सृष्टि है क्या, यानी द्रव्य को समझों कि सृष्टि एक द्रव्यों का समूह है। सृष्टि को समझने के बाद समझो भाग्य को, किस्मत को। हमारा अतीत का भाग्य कैसा रहा है, हमें भाग्य बनाना है या भाग्य बन चुका है, भाग्य बनाना और अतीत का बनना ये सब तुम्हारे हाथ मे दिया है।
हमारे शास्त्रो में प्रकृति ने भी भाग्य रूपी बिल के नीचे लिखा है भूल चूक लेना देना। यदि कल तुमसे कोई भूल हुई है जो भाग्य में गलत लिखा गया है, उसको हम एक मौका और देते है, सच्चा पुरुषार्थ करके आप अपने भाग्य की लकीरें बदल सकते हैं, कुछ हद तक, निधत्त निकाचित नही। जिसका नाम हमारे शास्त्रों में है उत्कर्षण, अपकर्षण, उदीरणा, संक्रमण, इनके माध्यम से हम अपने भाग्य की लकीरों में हेरा फेरी कर सकते हैं।






उन्होंने कहा अतीत का तो कोई भरोसा नहीं, किस्मत पर भरोसा है नहीं क्योंकि इतिहास तो सबका काला ही होता है, इतिहास अज्ञान रूप होता है लेकिन पुरुषार्थ जो आज हमारे हाथ में है, वही सबसे बड़ी चीज है। अपन सब कितने भाग्यशाली है यह आपका जन्म जैनकुल में हुआ, कितने पापों से बच गए, यदि धीवर होते तो गुरु महाराज एक मछली का त्याग करा रहे होते, यदि मातंग होते तो कौवे के माँस त्याग करा रहे होते। आज कौवे का तो छोड़ो, माँस का ही संस्कार नही है। आज तुम ऐसे कुल में आये हो जो जन्म से ही माँ बाप ने तुम्हे कितने पापों से बचा लिया।आज संस्थान की वजह से 80 साल के दादा जी नीचे बैठते है और जिस गद्दी पर मुनि महाराज बैठते है, उस पर तुम्हे बैठने का सौभाग्य मिल रहा है। हर चीज को अहोभाग्य मानों, थोड़ी सा भी अच्छा मिलता है तो अनुभव करो मैं कितना भाग्यशाली हूँ। जीवन एक स्वप्न है जिसे साकार करना है, जीवन एक चुनौती है जिसे स्वीकार करना है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
