जिसके हृदय में प्रभु भक्ती समायी होती है,उसके आभामंडल का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है कि चमत्कारिक घटनाऐं घटती है प्रमाण सागर महाराज

धर्म

“जिसके हृदय में प्रभु भक्ती समायी होती है,उसके आभामंडल का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है कि चमत्कारिक घटनाऐं घटती है प्रमाण सागर महाराज
जिसके हृदय में प्रभु भक्ती समायी होती है,उसके आभामंडल का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है कि चमत्कारिक घटनाऐं घटती है उपरोक्त उदगार संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव विद्यासागरजी महामुनिराज के शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने भक्तामर स्त्रोत्र के अड़तीसवे छंद की व्याख्या करते हुये व्यक्त किये”

 

मुनि श्री ने कहा कि हालांकि मैं आजकल के किसी भी बाहरी चमत्कार पर विश्वास नहीं करता लेकिन प्रभु की निश्चल भक्ती के कई चमत्कार सामने आए है,तो मैं ऐसा म मानता हूं कि

 

“जिसके हृदय में प्रभु भक्ती समायी होती है उनका पुण्य गाड़ा होता है,और जिसका पुण्य गाड़ा होता है उसके आभामंडल से ही चमत्कार घटित होते है। आचार्य मानतुंग प्रभु की भक्ती में उस चरमसीमा तक लीन है उनके मुख से जो भी छंद मुखरित हो रहे है वह किसी मंत्र से कम नहीं है …

“श्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल,मत्त-भ्रमद्-भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्,ऐरावताभमिभ-मुद्धत-मापतन्तं दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्” छंद का अर्थ बताते हुये मुनि श्री कहते है कि भगवान की निश्चल भक्ती का ही प्रभाव है कि उसके आभामंडल के सामने एक मदमस्त हाथी अपना समर्पण कर देता है

 

मुनि श्री ने कहा कि समय समय पर ऐसी कही घटनाएं घटी है,और घटती भी रहती है उन्होंने जयपुर राजघराने कि एक घटना सामने रखते हुये कहा हालांकि घटना 200 वर्ष पुरानी है, दीवान अमरचंद्र जो कि जिनेन्द्र भगवान के परम भक्त थे उनकी विद्वता से चिढ़कर दरबारियों ने राजा के कान भरे तो राजा ने मंत्री दीवान चंद्र को बुलाया और कहा कि तुम्हें अपनी “अहिंसा” को शेर के समक्ष अहिंसक भोजन कराके सिद्ध करना होगा। दूसरे दिन पिंजरे में बंद तीन दिन भूखे शेर के सामने दीवान अमरचंद्र जलेबी का थाल और कड़ाई भर दूध लेकर गये और कहा कि हे मृगराज यदि तुझे अपनी भूख मिटानी है तो यह स्वादिष्ट जलेबी और दूध है उससे मिटा लो और यदि मांस ही चाहिये तो यह लो मेरा शरीर आपके सामने हाजिर है? कहते है कि शेर ने उनको देखा और उनके आभामंडल से प्रभावित होकर उनके पास गया और उनके चरण चूमे तथा तीन परिक्रमा कर दूध जलेबी खा गया,राजा सहित सभी दरवारी आश्चर्यचकित थे। आज भी जयपुर की नसिया में यह घटना वर्णित है।

दूसरी घटना 2005 रांची में प्रतिष्ठाचार्य मोक्षकल्याणक की क्रिया करा रहे थे कि असावधानी से अचानक आग लगी और रुई के बने पहाड़ ने आग पकड़ ली लोग कुछ समझ पाते कि वहां उपस्थित अशोक नगर के युवावर्ग ने वहा पर रखे शांतीधारा के जल को उस आग पर डाला तो वह अग्नि अ तत्काल बुझ गयी। इस प्रकार की और कही घटनाओं को सुनाते हुये कहा कि जिसने भगवान शरण ले ली उसके ऊपर काल रुप खुंखार शेर का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता भगवान आपके मात्र नाम स्मरण से प्रलयकारी अग्नी भी शांत हो जाती है।

धर्म प्रभावना समिति के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि 17 नबम्वर को मुनिसंघ का पिच्छिका परिवर्तन समारोह आयोजित है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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