मनुष्य का मन अनुभूत है –?**मन हँसाता भी है, रूलाता भी है।अन्तर्मना आचार्य प्रसन्नसागरजी महाराज
कुलचाराम हैदराबाद
अन्तर्मना आचार्य प्रसन्नसागरजी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा किमनुष्य का मन अनुभूत है –?*मन हँसाता भी है, रूलाता भी है।*मन मित्र भी बनाता है, तो दुश्मन भी बना देता है।मन दिशा भी देता है और दशा भी बिगाड़ देता है।मन सुलझाता भी है और उलझाता भी है।मन सुख भी देता है, तो दु:ख भी देता है।मन परमात्मा से भी मिलाता है, तो शैतान भी बनाता है।
महाराज श्री ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कियदि कोई पूछे कि मन क्या है-? इसका उत्तर अनुत्तरित है। मन का प्रश्न बहुत उलझा हुआ है। सदियों से ये उलझा हुआ आ रहा है और भविष्य में कब सुलझेगा-? पता नहीं। आज सब अपने मन से ही परेशान और अशांत है। आज भी मन एक अनबुझ पहेली बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि मन को जहाँ लगाना चाहिए, वहाँ तो लगता नहीं है। और जहाँ नहीं लगाना है, वहाँ से हटता नहीं है। बस मन की यही परेशानी, सबके मन को परेशान कर रही है। मन की बाल्टी पर यदि सन्तोष की पेंदी लगा दो, तो शायद मन इतना परेशान नहीं होगा, जितना बिन पेंदी की बाल्टी से है। मन बदलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है।
इसलिए –सम्मान में फूलो मत..और अपमान में कूलो मत…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्तजानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
