हमने जो सुख दुख उठाए हैं वो उपादान शक्ति के कारण उठाए है सुधा सागर महाराज
सागर 02 अक्टूबर 2024, बुधवार• भाग्योदय तीर्थक्षेत्र, सागर में मंगल प्रवचन देते हुए पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108 श्री सुधा सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि प्रत्येक वस्तु में दो शक्ति विद्यमान रहती है,एक उत्पादन शक्ति जो कार्य रूप में परिणत होती है,एक निमित्त जो दूसरे के लिए परिणमन करने में सहायक बनती है।यह दो शक्तियां हमारी आत्मा में विद्यमान है।
महाराज श्री ने कहा कि कार्य होने का एक लक्षण हैं, यदि कार्य हुआ तो इन दोनों में से कोई कमजोर नहीं है,दोनों बराबर के मिले है। जब हमारी निमित्त शक्ति जागती है तो जगत का कल्याण होता है या विनाश होता है। जब हमारी उपादान शक्ति जागती है स्व का कल्याण होता है या स्व का विनाश होता है।
हमने सुख या दुःख जो भी उठाए हैं, वो उपादान शक्ति के कारण उठाये है। हम अच्छे है या बुरे है तो उपादान शक्ति कारण है,

चारों तरफ हमारा एक वर्तुल बनना चाहिए तत्व दृष्टि का। जिस व्यक्ति की तत्वदृष्टि बन जाती है, उस व्यक्ति की उपादान शक्ति जाग जाती है। हमें गुरुओ से, शास्त्रों से, णमोकार मंत्र से उपादान शक्ति का जागरण करना है। जैन दर्शन का मूल स्रोत है उपादान शक्ति। तुम किसी से कुछ मत चाहो, तुम इतना ही चाहों कि मेरे में इतनी शक्ति आ जाये कि मैं हर समस्या का खुद समाधान कर सकूँ। मुझे किसी के सहारे की जरूरत न पड़े, यहाँ तक कि भगवान के सहारे की भी नही।
जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए महाराज श्री ने कहा कि जैनग्रन्थों में कहा कोई भी अशुभ कार्य करते समय थोड़ा सावधान रहना। कहीं इतना अशुभ कर्म न कर लेना जिसमें कर्म का बंध लाइलाज हो जाए, जिसका कोई इलाज ही न हो। वह कर्म बंध उस समय होता है जब व्यक्ति कुछ भी करने के लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, भव की मर्यादा का उल्लंघन कर देता है। हम जिंदगी अनेकांत से नहीं जी पाएंगे, सापेक्ष से जिएंगे और सापेक्षवाद एक ऐसी बागडोर है कि हम चाहे तो अपनी जिंदगी जैसे जीना चाहे वैसे जीयेंगे। हमारे लिए कुछ भी चीज बुरी नहीं दिखेगी, संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब अच्छा है, जो हुआ है, वो सब अच्छा है, जो होगा वह अच्छा है। ये कहना सरल है लेकिन इसकी अनुभूति कठिन है और जिस दिन यह अनुभव की पर्याय बन जाएगी तो उसी का नाम सर्वज्ञ है।
उन्होंने प्रश्नवाचक लगाते हुए कहा कि क्या आपने इतनी साधना कर ली है कि जहाँ शत्रु और मित्र की भेद रेखाएं खत्म हो गई हो तो तुम्हारे लिए कोई नियम, व्रत नही है, जो चाहे देखो, जो चाहे सुनो। यदि ये ज्ञायक शक्ति न जाग पाये तो दूसरी उपादान शक्ति होती है जिसमें हम जागरूक रहेंगे, उपादान शक्ति साधना है। उपादान शक्ति का अर्थ है कि जो कुछ भी तुम्हारी जिंदगी में घटित हो रहा है, उस सबका श्रेय किसको है, अच्छा और बुरा, मैं स्वयं इसका कर्ता धर्ता हूँ। यदि यह साधना जिंदगी में हो गई तो उपादान शक्ति के सामने कोई मायने ही नही है अच्छा हो और बुरा, और होगा तो वह टलेगा। हमें कोई बीमारी नहीं होगी और होगी तो उसका इलाज होगा। यदि तुम्हें और उपादान शक्ति जगाना है तो अच्छे कार्यो का श्रेय किसी को थोपों।
किसी से गिलास भी टूट जाये तो उपादान शक्ति वाला कहता है कि ये मेरे लाभांतराय या भोगान्तराय कर्म के उदय से फूटा है, मेरे कर्म का उदय था इसलिए उसने फोड़ दिया, दोषी मैं हूँ, गुस्सा शांत हो जाएगा क्योंकि जब स्वयं की गलती महसूस होती है तो व्यक्ति को क्रोध नहीं आता। साधु का मन क्यों आज्ञा में है क्योंकि हम लोग तीन आज्ञाओं को मानते है, भगवान की, गुरु की, जिनवाणी की आज्ञा में चलता हूँ, ये तीन आज्ञाएँ मानता हूँ तब मन मेरी आज्ञा मानता है। यदि तुम्हारा विश्वास है कि 24 घंटे भगवान की, गुरु की, जिनवाणी की आज्ञा में मेरा जीवन है, नियम से आपका मन आपकी आज्ञा में चलेगा। मेरी कभी किसी का बुरा नहीं दिखती, मैंने आगम के अनुसार बुरा देखने का त्याग कर दिया, जब मेरा नियम है तो आँख की क्या ताकत है कि वह किसी का बुरा देख ले। हम कैसे हैं? हम दुनिया को बुरा कहते हैं। किस्मत बुरी नहीं होती, हम खुद बुरे होते हैं और यदि हम अच्छे हैं तो बुरी किस्मत भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।
उपकार शक्ति को निमित्त शक्ति भी कहते हैं, निमित्त शक्ति दो रूप में होती है, तुम किसी का बुरा और अच्छा करने में निमित्त बन सकते हो। तुम 24 घंटे जागृत हो जाओ कि मेरी निमित्त शक्ति किसी का अहित नहीं करेगी चाहे वह दुश्मन भी क्यों न हो क्योंकि मेरे मन में निमित्त शक्ति जागी है यदि मैं किसी का बुरा विचारुँ तो उसका बुरा हो सकता है। यदि मेरे पास ताकत है तुम्हें सारी जगत का उपकार करूँगा। उपादान शक्ति से भगवान बनते हैं और निमित्त शक्ति से तीर्थंकर बनते है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
